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________________ सप्तदशं पर्व केशान् भगवतो मूर्ध्नि चिरवासात्पविनितान् । 'प्रत्यैच्छन्मघवा ररनपटल्यां प्रीतमानसः ॥२०४॥ . सितांशुकप्रतिच्छन्ने पृथौ रत्नसमुद्गकै । स्थिता रेजुर्विमोः केशा यथेन्दोर्लक्ष्मलेशकाः ॥२०५॥ विभूत्तमाजसंस्पर्शादिमे मूर्धन्यतामिताः । स्थाप्याः समुचिते देशे कस्मिंश्चिदनुपद्रुते ॥२०६॥ पञ्चमस्यार्णवस्यातिपवित्रस्य निसर्गतः । नीत्वोपायनतामते स्थाप्यास्तस्य शुचौ जले ॥२०७।। धन्याः केशा जगद्मर्तुयेऽधिमूर्धमधिष्ठिताः । धन्योऽसौ क्षीरसिन्धुश्च यस्तानाप्स्यत्युपायनम् ॥२०८॥ इत्याकलय्य नाकेशाः केशानादाय सादरम् । विभूत्या परया नीस्वा क्षीरोदे तान्विचिक्षिपुः ॥२०॥ महतां संश्रयान्नूनं यान्तीज्या मलिना अपि । मलिनैरपि यत्केशः पूजावाप्ता श्रितैर्गुरुम् ॥२१०॥ वस्त्राभरणमाल्यानि यान्युन्मुक्तान्यधीशिना । तान्यप्यनन्यसामान्यां निन्युरत्युमति सुराः ॥२११॥ चतुःसहस्रगणना नृपाः प्रावाजिषुस्तदा । गुरोर्मतमजानाना स्वामिभक्त्यैव केवलम् ॥२१२॥ यदस्मै रुचितं भने तदस्मभ्यं विशेषतः । इति प्रसन्मदीक्षास्ते केवलं द्रव्यलिङ्गिनः ॥२१३॥ 'छन्दानुवर्तनं भर्तु त्याचारः किलेत्यमी । भेजुः समौढयं नैर्ग्रन्थ्यं द्रग्यतो न तु भावतः ॥२१४॥ गरीयसी गुरौ भक्तिमुच्चराविश्चिकीर्षवः"। "तवृत्तिं बिभरामासुः पार्थिवास्ते समन्वयाः ॥२५॥ मासके कृष्ण पक्षको नवमीके दिन सायंकालके समय दीक्षा धारण की थी। उस दिन शुभ मुहूर्त था, शुभ लग्न थी और उत्तराषाढ़ नक्षत्र था ॥२०३॥ भगवान्के मस्तकपर चिरकाल तक निवास करनेसे पवित्र हुए केशांको इन्द्रने प्रसन्नचित्त होकर रत्नोंके पिटारेमें रख लिया था ।।२०४।। सफेद वस्त्रसे परिवृत उस बड़े भारी रत्नोंके पिटारेमें रखे हुए भगवानके काले केश ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो चन्द्रमाके काले चिहके अंश हो हो ॥२०५।। 'ये केश भगवानके मस्तकके स्पर्शसे अत्यन्त श्रेष्ठ अवस्थाको प्राप्त हुए हैं इसलिए इन्हें उपद्रवरहित किसी योग्य स्थानमें स्थापित करना चाहिए। पाँचवाँ क्षीरसमुद्र स्वभावसे ही पवित्र है इसलिए उसकी भेंट कर उसीके पवित्र जलमें इन्हें स्थापित करना चाहिए। ये केश धन्य हैं जो कि जगत्के स्वामी भगवान् वृषभदेवके मस्तकपर अधिष्ठित हुए थे तथा यह क्षीरसमुद्र भी धन्य है जो इन केशोंको भेंटस्वरूप प्राप्त करेगा।' ऐसा विचारकर इन्द्रोंने उन केशोंको आदरसहित उठाया और बड़ी विभूतिके साथ ले जाकर उन्हें क्षीरसमुद्रमें डाल दिया ॥२०६-२०९।। पुरुषांका आश्रय करनेसे मलिन (नीच) पुरुष भी पूज्यताको प्राप्त हो जाते हैं यह बात बिलकुल ठीक है क्योंकि भगवानका आश्रय करनेसे मलिन (काले) केश भी पूजाको प्राप्त हुए थे ।।२१०।। भगवान्ने जिन वस्त्र आभूषण तथा माला वगैरहका त्याग किया था देवोंने उन सबकी भी असाधारण पूजा की थी ।।२११॥ उसी समय चार हजार अन्य राजाओंने भी दीक्षा धारण की थी। वे राजा भगवानका मत (अभिप्राय) नहीं जानते थे, केवल स्वामिभक्तिसे प्रेरित होकर ही दीक्षित हुए थे ।।२१२॥ 'जो हमारे स्वामीके लिए अच्छा लगता है वही हम लोगोंको भी विशेष रूपसे अच्छा लगना चाहिए. बस, यही सोचकर वे राजा दीक्षित होकर द्रव्यलिंगी साधु हो गये थे ।।२१३॥ स्वामीके अभिप्रायानुसार चलना ही सेवकोंका काम है यह सोचकर ही वे मूढ़ताके साथ मात्र द्रव्यकी अपेक्षा निग्रन्थ अवस्थाको प्राप्त हुए थे- नग्न हुए थे, भावोंकी अपेक्षा नहीं ।।२१४॥ बड़े-बड़े वंशोंमें उत्पन्न हुए वे राजा, भगवान्में अपनी उत्कृष्ट भक्ति प्रकट करना १. आददे । २. छादिते। ३. संघटके। ४. मान्यताम् । ५. अनुपद्रवे । ६. प्राप्स्यति । ७. पूजावाप्याश्रित-अ०, १०, इ., द०, म०, ल०। ८. -4 चोदिताः ८०, इ०, म., ल.। -व नोदिताः अ., प०, स०। ९. इच्छानुवर्तनम् । १०. प्रकटीकर्तुमिच्छवः । ११. परमेश्वरवर्तनम् । १२. महान्वयाः प०,०, ८०, म०, ल०, स० । समन्वयाः समाकुलचित्ताः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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