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________________ सप्तदशं पर्व ३८२. ततः प्राप सुरेन्द्राणां पृतना व्याप्य रोदसी । वयोरुतरिवाहानं कुर्वरिसद्धार्थकं धनम् ।।१८२॥ तत्रैकस्मिन् शिलापट्टे सुरः प्रागुपकल्पिते । प्रथीयसि शुचौ स्वस्मिन् परिणाम इवोमते ॥१८३॥ चन्द्रकान्तमय चन्द्रकान्तशो भावहासिनि । पुजीभूत इवैकत्र स्वस्मिन् यशसि निर्मले ।।१८४॥ स्वभावभास्वरे रम्ये सुवृत्तपरिमण्डले । सिद्धक्षेत्र इव द्रष्टुं तां भूतिं भुवमागते ।।१८५॥ सुशीतलतरुच्छायानिरूद्धोष्णकरविषि । पर्यन्तशाखिशाखाप्रविगलस्कुसुमोत्करे ।।१८।। श्रीखण्डद्वदत्ताच्छच्छटामङ्गलसंगते । शचीस्त्र हस्तविन्यस्तरत्नचूर्णोपहारकं ।।१८७॥ *विशंकटपर्टीक्लप्तविचित्रपटमण्डपे । मन्दानिलचलच्चित्रकेतुमालातताम्बरे ॥१८॥ समन्तादुर्च रख पधूमामोदितदिङ्मुखे । पर्यन्तनिहितानल्पमङ्गलद्रव्यसंपदि ।।१८९॥ इत्यनल्पगुणे तस्मिन् शस्तवास्तुप्रतिष्ठिते । यानादवातरदे॒वः सुरः क्ष्मामवतारितात् ॥१९०।। तजन्माभिषेकद्धिः या शिला पाण्डुकाया। पश्यनेनं शिलापट्टे विभुस्तस्याः समस्मरत् ॥१९१॥ तत्र क्षणमि' 'वासीनो यथास्वमनुशासनः २ । विभुः "सभाजयामास समां सनूसुरासुराम् ॥१९२॥ वन उस अयोध्यापुरीसे न तो बहुत दूर था और न बहुत निकट ही था ।।१८१॥ तदनन्तर इन्द्रोंकी सेना भी आकाश और पृथिवीको व्याप्त करती हुई उस सिद्धार्थक बनमें जा पहुंची। उस बनमें अनेक पक्षी शब्द कर रहे थे इसलिए वह उनसे ऐसा मालूम होता था मानो इन्द्रोंकी सेनाको बुला ही रहा हो ॥१८२।। उस वनमें देवोंने एक शिला पहलेसे ही स्थापित कर रखी थी। वह शिला बहत ही विस्तृत थी, पवित्र थी और भगवानके परिणामोंके समान उन्नत थी॥१८३।। वह चन्द्रकान्त मणियोंकी बनी हुई थी और चन्द्रमाकी सुन्दर शोभाको हँसी कर रही थी इसलिए ऐसी मालूम होती थी मानो एक जगह इकट्ठा हुआ भगवानका निर्मल यश ही हो ॥१८४॥ वह स्वभावसे ही देदीप्यमान थी, रमणीय थी और उसका घेरा'अतिशय गोल था इसलिए वह ऐसी मालूम होती थी मानो भगवान् के तपःकल्याणककी विभूति देखने के लिए सिद्धक्षेत्र ही पृथिवीपर उतर आया हो ॥१८५।। वृक्षोंकी शीतल छायासे उसपेर सूर्यका आतप रुक गया था और चारों ओर लगे हुए वृक्षोंकी शाखाओंके अग्रभागसे उसपर फूलोंके समूह गिर रहे थे ॥१८६।। वह शिला घिसे हुए चन्दन-द्वारा दिये गए मांगलिक छींटोंसे युक्त थी तथा उसपर इन्द्राणीने अपने हाथसे रत्नोंके चूर्णके उपहार खींचे श्रे-चौक वगैरह बनाये थे ॥१८७। उस शिलापर बड़े-बड़े वस्त्रों द्वारा आश्चर्यकारी मण्डप बनाया गया था तथा मन्दमन्द वायुसे हिलती हुई अनेक रंगकी पताकाओंसे उसपर-का आकाश व्याप्त हो रहा था ॥१८८।। उस शिलाके चारों ओर उठते हुए धूपके धुओंसे दिशाएँ सुगन्धित हो गयी थीं तथा उस शिलाके समीप ही अनेक मंगलद्रव्यरूपी सम्पदाएँ रखी हुई थीं ॥१८९॥ इस प्रकार जिसमें अनेक गुण विद्यमान हैं तथा जो उत्तम घरके लक्षणोंसे सहित है ऐसी उस शिलापर, देवों-द्वारा पृथिवीपर रखी गयी-पालकीसे भगवान वृषभदेव उतरे ॥१९०|| उस शिलापट्टको देखते ही भगवानको जन्माभिषेककी विभूति धारण करनेवाली पाण्डुकशिलाका स्मरण हो आया ॥१९१।। तदनन्तर भगवानने झण-भर उस शिलापर आसीन होकर मनुष्य, देव तथा धरणेन्द्रोंसे भरी हुई उस सभाको यथायोग्य उपदेशोंके द्वारा सम्मानित किया ॥१९२।। वे भगवान् जगत्के बन्धु थे १. द्यावापृथिव्यो। २. पक्षिस्वनैः। ३. अतिभूयसि । ४. कान्तशोभा-मनोज्ञशोभा। शोभोपहासिनी, ल०, म०। ५. परिनिष्क्रमणकल्याणसम्पदम् । ६. स्वकरविरचितरत्नचूर्णरंगवलौ । ७. विशालवस्त्रकृतचित्रपटोविशेपे । ८. उद्गच्छत् । प्रशस्तगृहलक्षण । १०. त्यं पाण्डुशिलाम् । ११. इव पादपूरणे । १३. सम्भावयति स्म । 'सभाज प्रीतिविशेषयोः'।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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