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________________ सफ़दर्श पर्व भवेदपि भवेदेतीतो मेरुं पुराप्ययम् । प्रत्यानीतश्च नाकीन्द्रेर्जन्मोत्सवविधित्सया ॥ १३६ ॥ स एवाद्यापि वृत्तान्तो जारखस्मद्भाग्यतो भवेत् । ततो न काचनास्माकं व्यथेत्यन्ये मिथोऽब्रुवन् ॥ १३७॥ किमेष भगवान् भानुरास्थितः शिविकामिमाम् । देदीप्यतेऽम्बरे माभिः प्रतुदृचिव नो दृशः ॥ १३८ ॥ ष्टतमौलिविभात्युच्चैस्तप्तचामीकरच्छविः । विभुर्मध्ये सुरेन्द्राणां कुलाद्रीणामिवाद्रिराट् ॥ १३९॥ विभोर्मुखोन्मुखीर्हष्टीर्दधानोऽद्भुतविक्रियः । कः 'स्विदाज्ञातमस्याज्ञाकरः सोऽयं पुरंदरः ॥१४०॥ शिविकावाहिनामेषामङ्गभासो महौजसाम् । समन्तात् प्रोल्लसन्स्येतास्तडितामिव रीतयः 1198911 महत्पुण्यमहो भर्तुरवाङ्मनसगोचरम् । पश्यता निमिषानेतान् प्रप्रणाानितोऽमुतः ॥ १४२ ॥ इतो मधुरगम्मीरं ध्वनन्त्येते सुरानकाः । इतो मन्द्रं मृदङ्गानामुच्चैरुच्चरति ध्वनिः ॥१४३॥ इतो नृत्यमितो गीतमितः संगीत मङ्गलम् । इतश्चामरसंघात इतश्चामरसंहतिः ॥ १४४॥ संचारी किमयं स्वर्गः 'साप्सरास्स विमानकः । किं वापूर्वमिदं चित्रं लिखितं व्योम्नि केनचित् ॥ १४५ ॥ किमिन्द्रजालमेतत्स्यादुतास्मन्मतिविभ्रमः । अदृष्टपूर्वमाश्चर्यमिदमीदृग्न जातुचित् ॥ १४६ ॥ इति कैश्चित्तदाश्चर्य पश्यद्भिः प्राप्तविस्मयैः । स्वैरं संजल्पितं पौरैर्जल्पाकैः सविकल्पकैः ॥ १४७॥ ३८५ पर सवार कर कहीं दूर ले जा रहे हैं परन्तु हम लोग इसका कारण नहीं जानते अथवा भगवानकी यह कोई ऐसी ही क्रीडा होगी अथवा यह भी हो सकता है कि पहले इन्द्र लोग जन्मोत्सव करनेकी इच्छासे भगवानको सुमेरु पर्वतपर ले गये थे और फिर वापस ले आये थ। कदाचित् हम लोगोंके भाग्यसे आज फिर भी वही वृत्तान्त हो इसलिए हम लोगोंको कोई दुःखको बात नहीं है ।। १३५-१३७|| कितने ही लोग आश्चर्यके साथ कह रहे थे कि पालकीपर सवार हुए ये भगवान क्या साक्षात् सूर्य हैं क्योंकि ये सूर्यकी तरह ही अपनी प्रभाके द्वारा हमारे नेत्रोंको चकाचौंध करते हुए आकाशमें देदीप्यमान हो रहे हैं || १३८ || जिस प्रकार कुलाचलोंके बीच चूलिकासहित सुवर्णमय सुमेरु पर्वत शोभित होता है उसी प्रकार इन्द्रोंके बीच मुकुट धारण किये और तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिको धारण किये हुए भगवान् बहुत ही सुशोभित हो रहे हैं || १३९ || जो भगवान के मुखके सामने अपनी दृष्टि लगाये हुए है. और जिसकी विक्रियाएँ अनेक आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली हैं ऐसा यह कौन है ? हाँ, मालूम हो गया कि यह भगवान्‌का आज्ञाकारी सेवक इन्द्र हैं ||१४० ।। इधर देखो, यह पालकी ले जानेवाले महातेजस्वी देवोंके शरीरकी प्रभा चारों ओर फैल रही है और ऐसी मालूम होती है. मानो बिजलियोंका समूह ही हो ॥ १४१॥ अहा, भगवान‌का पुण्य बहुत ही बड़ा है वह न तो वचनसे ही कहा जा सकता है और न मनसे ही उसका विचार किया जा सकता है। इधरउधर भक्ति के भारसे झुके हुए प्रणाम करते हुए इन देवोंको देखो ॥१४२॥ - इधर ये देवोंके नगाड़े मधुर और गम्भीर शब्दोंसे बज रहे हैं और इधर यह मृदंगोंका गम्भीर तथा जोरका शब्द हो रहा है || १४३।। इधर नृत्य हो रहा है, इधर गीत गाये जा रहे हैं, इधर संगीत मंगल हो रहा है, इधर चमर डुलाये जा रहे हैं और इधर देवोंका अपार समूह विद्यमान है || १४४|| क्या यह चलता हुआ स्वर्ग है जो अप्सराओं और विमानोंसे सहित है अथवा आकाशमें यह किसीने अपूर्व चित्र लिखा है || १४५|| क्या यह इन्द्रजाल है - जादूगरका खेल है अथवा हमारी बुद्धिका भ्रम है । यह आश्चर्य बिलकुल ही अदृष्टपूर्व है - ऐसा आश्चर्य हम लोगोंने पहले कभी नहीं देखा था || १४६ || इस प्रकार अनेक विकल्प करनेवाले तथा बहुत बोलनेवाले नगर १. विधातुमिच्छया । २. अभिमुखी । ३. कि स्विदा-स०, ६०, प०, अ० । ४. 'स्वित् प्रश्ने वितर्के च' । ५. मालाः । ६. अवाङ् मानस - ३०, ल० म० । ७. वाद्य । ८ साप्सरः सविमानकः अ०, स०, ल०, म० । ९. वाचालः । ४९
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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