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________________ ३७८ आदिपुराणम् धातारमामनन्ति त्वां जेतारं कर्मविद्विषाम् । नेतारं धर्मतीर्थस्य त्रातारं च जगद्गुरुम् ॥५४॥ मोहपङ्के महत्यस्मिन् जगन्मग्नमशेषतः । धर्महस्तावलम्बेन त्वया'मझद्धरिष्यते ॥५९॥ त्वं स्वयंभःस्वयंबुद्धसन्मार्गो मुक्तिपद्धतिम् । यत्प्रबोधयिता स्यस्मानकस्मात् करुणाधीः ॥६॥ त्वं बुद्धोऽसि स्वयंबुद्धः त्रिबोधामललोचनः । यद्वेरिस स्वत एवाद्य मोक्षस्य पदवी प्रयीम् ॥६॥ स्वयं प्रबुद्धसन्मार्गस्त्वं न बोध्योऽस्मदादिमिः । किन्वास्माको नियोगोऽयं मुखरीकुरुतेऽद्य नः ॥३२॥ जगप्रबोधनोद्योगे न स्वमन्यैनियुज्यसे । भवनोद्योतने किनु केनाप्युत्थाप्यतेऽशुमान् ॥६३॥ अथवा बोधितोऽप्यस्मान् बोधयस्यपुनर्भव । बोधितोऽपि यथा दीपो भुवनस्वोपकारकः ॥६॥ सद्योजातस्त्वमायेऽमः कल्याणे वामतामतः । प्राप्तोऽनन्तरकल्याणे धत्से "सम्प्रत्यघोरताम् ॥६५॥ भुवनस्योपकाराय कुरूयोगं "स्वमीशितः । त्वां नवानमिवासेज्य प्रीयन्तां भव्यचातकाः ॥६६॥ किरणें समस्त जगत्को प्रकाशित करती हुई कमलोंको प्रफुल्लित करती हैं उसी प्रकार आपके वचनरूपी देदीप्यमान किरणें भी समस्त संसारको प्रकाशित करती हुई भव्यजीवरूपी कमलोंको प्रफुल्लित करेंगी ॥५७॥ हे देव, लोग आपको जगत्का पालन करनेवाले ब्रह्मा मानते हैं, कर्मरूपी शत्रुओंको जीतनेवाले विजेता मानते हैं, धर्मरूपी तीर्थके नेता मानते हैं और सबकी रक्षा करनेवाले जगद्गुरु मानते हैं ।।५८|| हे देव, यह समस्त जगत् मोहरूपी बड़ी भारी कीचड़में फँसा हुआ है इसका आप धर्मरूपी हाथका सहारा देकर शीघ्र ही उद्धार करेंगे ।।५९॥ हे देव, आप स्वयम्भू हैं, आपने मोक्षमार्गको स्वयं जान लिया है और आप हम सबको मुक्तिके मार्गका उपदेश देंगे इससे सिद्ध होता है कि आपका हृदय बिना कारण हो करुणासे आई है ॥६०॥ हे भगवन् , आप स्वयं बुद्ध हैं, आप मति-श्रुत और अवधि ज्ञानरूपी तीन निर्मल नेत्रोंको धारण करनेवाले हैं तथा आपने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनोंकी एकता रूपी मोक्षमार्गको अपने आप ही जान लिया है इसलिए आप बुद्ध हैं ।।६।। हे देव, आपने सन्मार्गका स्वरूप स्वयं जान लिया है इसलिए हमारे-जैसे देवोंके द्वारा आप प्रबोध करानेके योग्य नहीं हैं तथापि हम लोगोंका यह नियोग ही आज हम लोगोंको वाचालित कर रहा है ॥६२।। हे नाथ, समस्त जगत्को प्रबोध करानेका उद्योग करनेके लिए आपको कोई अन्य प्रेरणा नहीं कर सकता सो ठीक ही है क्योंकि समस्त जगत्को प्रकाशित करनेके लिए क्या सूर्यको कोई अन्य उकसाता है ? अर्थात् नहीं। भावार्थ-जिस प्रकार सूर्य समस्त जगत्को प्रकाशित करनेके लिए स्वयं तत्पर रहता है उसी प्रकार समस्त जगत्को प्रबुद्ध करनेके लिए आप स्वयं तत्पर रहते हैं ॥६३।। अथवा हे जन्म-मरणरहित जिनेन्द्र, आप हमारे-द्वारा प्रबोधित होकर भी हम लोगोंको उसी प्रकार प्रबोधित करेंगे जिस प्रकार जलाया हुआ दीपक संसारका उपकारक होता है अर्थात् सबको प्रकाशित करता है ॥६४।। हे भगवन, आप प्रथम गर्भकल्याणकमें सद्योजात अर्थात् शीघ्र ही अवतार लेनेवाले कहलाये, द्वितीय-जन्मकल्याणकमें वामता अर्थात् सुन्दरताको प्राप्त हुए और अब उसके अनन्तर तृतीय-तपकल्याणकमें अघोरता अर्थात् सौम्यताको धारण कर रहे हैं ।।६५।। हे स्वामिन, आप संसारके उपकारके लिए उद्योग कीजिए, ये १. सपदि । २. मोक्षमार्गम्। ३. यत् कारणात् । ४. बोधयिष्यन्ति । ५. कारणमन्तरेण यतः स्वयबुद्धसन्मार्गस्ततः। यत् यस्मात् कारणात् अस्मान् मुक्तिपद्धतिमकस्मात् प्रबोधयितासि तस्मात् करुणार्द्रधीः करुणायाः कार्यदर्शनात् उपचारात् करुणाधोरित्युच्यते । मुख्यतः मोहनीयकार्यभूतायाः करुणाया अभावात् । ६. जानासि । ७. रत्नत्रयम् इत्यर्थः । ८. अस्मत्संबन्धी। किन्त्वस्माकं अ०,५०, इ., स०। ९. मनोहरताम् । वामतां मतः म०, ल०।१०. प्राप्तेऽनन्तर-म०, ल०। ११. परिनिष्क्रमणकल्याणे । १२. सुखकारिताम् । १३. भूनाथः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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