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________________ ३६० आदिपुराणम् करहाटमहाराष्ट्रसुराष्ट्राभीरकोणाः । वनवासान्ध्रकर्णाटकोसलानोलकरलाः ॥१५४॥ दाभिसारसौवीरशूरसेनापरान्तकाः । विदहसिन्धुगान्धारपवनादिपल्लवाः ॥१५५॥ काम्बोजा रट्टबाहीकतुरुष्कशककयाः । निवेशितास्तथान्येऽपि विभका विषयास्तदा ॥१५६॥ अदेवमातृकाः कंचिद् विषया देवमातृकाः । पर साधारणाः केचिद् यथास्वं ते निवेशिताः ॥१५७॥ अभूतपूर्वैरुद्भूतैर्भूरभात्तैर्जनास्पदैः । दिवः खण्डेरिवायातैः कौतुकाद्धरणीतलम् ॥१५८॥ देशैः साधारणानपजाङ्गलस्तैस्तता मही । रेजे रजतभूम रारादा च पयोनिधेः ॥१५९॥ तदन्तेष्वन्तपालानां दुर्गाणि परितोऽभवन् । स्थानानि लोकपालानामिव स्वर्धामसीमसु ॥१६॥ तदन्तरालदेशाश्च बभूवुरनुरक्षिताः । लुब्धकारण्यचरके पुलिन्दशवरादिमिः ॥१६१॥ मध्ये जनपदं रंजू राजधान्यः परिष्कृताः । वप्रप्राकारपरिखागोपुराट्टालकादिमिः ॥१६२॥ तानि स्थानीयसंज्ञानि'दुर्गाण्यावृत्य सर्वतः। ग्रामादीनां निवेशोऽभूद् यथाभिहितलक्ष्मणाम्॥१६॥ प्रामावृतिपरिक्षेपमात्राः स्युरुचिता"श्रयाः । शूद्रकर्षकभूयिष्टाः "सारामाः सजलाशया ॥१६॥ "ग्रामाः[ग्राम: ] "कुलशतेनेष्टो "निकृष्टः समधिष्ठितः। परस्तत्पश्च'शत्या स्यात् सुसमृद्धकृषीवल:१६५ दारु, अभिसार, सौवीर, शूरसेन, अपरान्तक, विदेह, सिन्धु, गान्धार, यवन, चेदि, पल्लव, काम्बोज, आरट्ट, वाहीक, तुरुष्क, शक और केकय इन देशोंकी रचना की तथा इनके सिवाय उस समय और भी अनेक देशोंका विभाग किया ॥१५२-१५६।। इन्द्रने उन देशोंमें-से कितने ही देश यथासम्भव रूपसे अदेवमातृक अर्थात् नदी-नहरों आदिसे सींचे जानेवाले, कितने ही देश देवमातृक अर्थात् वर्षाके जलसे सींचे जानेवाले और कितने ही देश साधारण अर्थात् दोनोंसे सींचे जानेवाले निर्माण किये थे ॥१५७। जो पहले नहीं थे नवीन ही प्रकट हुए थे ऐसे देशोंसे वह पृथिवीतल ऐसा सुशोभित होता था मानो कौतुकवश स्वर्गके टुकड़े ही आये हों ॥१५८॥ विजयार्ध पर्वतके समीपसे लेकर समुद्र पर्यन्त कितने ही देश साधारण थे, कितने ही बहुत जलवाले थे और कितने ही जलकी दुर्लभतासे सहित थे, उन देशोंसे व्याप्त हुई पृथिवी भारी सुशोभित होती थी ॥ १५९ ॥ जिस प्रकार स्वर्गके धामों-स्थानोंकी सीमाओंपर लोकपाल देवोंके स्थान होते हैं उसी प्रकार उन देशोंकी अन्त सीमाओंपर भी सब ओर अन्तपाल अर्थात् सीमारक्षक पुरुषोंके किले बने हुए थे। १६० ॥ उन देशोंके मध्य में और भी अनेक देश थे जो लुब्धक, आरण्य, चरट, पुलिन्द तथा शबर आदि म्लेच्छ जातिके लोगोंके द्वारा रक्षित रहते थे ॥ १६१ ॥ उन देशोंके मध्यभागमें कोट, प्राकार, परिखा, गोपुर और अटारी आदिसे शोभायमान राजधानी सुशोभित हो रही थीं ॥ १६२ ॥ जिनका दूसरा नाम स्थानीय है ऐसे राजधानीरूपी किलेको घेरकर सब ओर शास्त्रोक्त लक्षणवाले गाँवों आदिकी रचना हुई थी ॥१६३। जिनमें बाड़से घिरे हुए घर हों, जिनमें अधिकतर शूद्र और किसान लोग रहते हों तथा जो बगीचा और तालाबोंसे सहित हों, उन्हें ग्राम कहते हैं ॥१६४॥ जिसमें सौ घर हों उसे निकृष्ट अर्थात् छोटा गाँव कहते हैं तथा जिसमें पाँच सौ घर हों और १.-कोङ्गणाः ब० । २. कम्बोजारक-स० । ३. नदीमातृकाः । ४. नदीमातृकदेवमातृक- मिश्राः । ५. देशः। ६. जलप्रायकर्दमप्रायः । ७. विजयाद्धस्य । ८. समीपात् । ९. समुद्रपर्यन्तम् । १०.-चरट प.. द०, म०, ल०। ११. प्राक्तनश्लोकोक्तराजधानीनामेव स्थानीयसंज्ञानि। १२. स्थानीयसंज्ञान्यावृत्य सर्वतस्तिष्ठन्तीति सम्बन्धः । १३. यथोक्तलक्षणानाम् । १४. मात्राभिरुचिता- अ०, स०, ल०, म०। १५. योग्यगृहाः। १६. आरामसहिताः । १७. ग्रामः ६०, स०, म., ल०, अ०,१०,ब० । १८, गृहशतेन । १९. जघन्यः । २०. उत्कृष्टः २१. गृह पञ्चशतेन । .
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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