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________________ ३५८ आदिपुराणम् अत्रान्तरे महौषध्यो दीप्तोषध्यश्च पादपाः । ससर्वोषधयः कालाजाताः प्रक्षीणशक्तिकाः ॥१३०॥ सस्यान्यकृष्टपच्यानि यान्यासन् स्थितयं नृणाम् । प्रायस्तान्यपि कालेन ययुर्विरलतां भुवि ॥१३१॥ रसवीर्य विपाकैस्तैः प्रहीणाः पादपा यदा । तदाता दिवाधाभिः प्रजा व्याकुलतां गताः ॥१३२॥ 'तत्प्रहाणान्मनोवृत्तिं दधाना ग्याकुलीकृताम् । नाभिराजमुपासंदुः प्रजा जीवितकाम्यया ॥१३३॥ नाभिराजाज्ञया स्रष्टुस्ततोऽन्तिकमुपाययुः । प्रजाः प्रणतमू नो जीवितोपायलिप्सया ॥१३४॥ अथ विज्ञापयामासुरित्युपेत्य सनातनम् । प्रजाः प्रजातसंत्रासाः शरण्यं शरणाश्रिताः ॥१३५॥ वान्छन्त्यो जीविका देव त्वां वयं शरणं श्रिताः। तमनायस्व लोकश तनुपाय'प्रदर्शनात् ॥१३६॥ विभो समूल' मुत्सन्नाः पितृकल्पा महाधिपाः। फलन्त्यकृष्टपच्यानि सस्यान्यपि च नाधुना ॥१३७॥ क्षुत्पिपासादिबाधाश्च दुन्वन्त्यस्मान्समुत्थिताः । न क्षमाः भणमप्यकं प्राणितुं प्रोमिताशनाः ।।१३८॥ शीतातपमहावातप्रवर्षीपप्लवश्व नः । निराश्रयान्दुनोत्यद्य अहि नस्तत्प्रतिक्रियाम् ॥१३९॥ स्वां देवमादिकर्तारं कल्पांघ्रिपमिवोन्नतम् । समाश्रिताः कथं भीतेः पदं स्याम वयं विभोः ॥१४॥ "ततोऽस्माकं यथाद्य स्याजीविका निरुपड़वा । तथोपदेष्टुमुद्योगं कुरु देव प्रसीद नः ॥१४१॥ धरदेवने गणना की है ।।१२९।। इसी बीचमें कालके प्रभावसे महौषधि, दीप्तौषधि, कल्पवृक्ष तथा सब प्रकारको ओषधियाँ शक्तिहीन हो गयी थीं॥१३०॥ मनुष्यों के निर्वाह के लिए जो बिना बोये हुए उत्पन्न होनेवाले धान्य थे वे भी कालके प्रभावसे पृथिवीमें प्रायः करके विरलताको प्राप्त हो गये थे-जहाँ कहीं कुछ-कुछ मात्रामें ही रह गये थे ॥१३१॥ जब कल्पवृक्ष रस, वीर्य और विपाक आदिसे रहित हो गये तब वहाँकी प्रजा रोग आदि अनेक बाधाओंसे व्याकुलताको प्राप्त होने लगी ।।१३२॥ कल्पवृक्षोंके रस, वीर्य आदिके नष्ट होनेसे व्याकुल मनोवृत्तिको धारण करती हुई प्रजा जीवित रहनेकी इच्छासे महाराज नाभिराजके समीप गयी ।।१३३।। तदनन्तर नाभिराजकी आज्ञासे प्रजा भगवान वपभनाथके समीप गयी और अपने जीवित रहनेके उपाय प्राप्त करनेकी इच्छासे उन्हें मस्तक झुकाकर नमस्कार करने लगी ।।१३४॥ अथानन्तर अन्नादिके नष्ट होनेसे जिसे अनेक प्रकारके भय उत्पन्न हो रहे हैं और जो सबको शरण देनेवाले भगवानकी शरणको प्राप्त हुई है ऐसी प्रजा सनातन-भगवान के समीप जाकर इस प्रकार निवेदन करने लगी कि ॥१३५।। हे देव, हम लोग जीविका प्राप्त करनेको इच्छासे आपकी शरणमें आये हुए हैं इसलिए. हे तीन लोकके स्वामी, आप उसके उपाय दिखलाकर हम लोगोंकी रक्षा कीजिए॥१३६॥ हे विभो, जो कल्पवृक्ष हमारे पिताके समान थे-पिताके समान ही हम लोगोंकी रक्षा करते थे वे सब मूलसहित नष्ट हो गये हैं और जो धान्य बिना बोये ही उत्पन्न होते थे वे भी अब नहीं फलते हैं ॥१३७।। हे देव, बढ़ती हुई भूख प्यास आदिकी बाधाएँ हम लोगोंको दुखी कर रही हैं। अन्न-पानीसे रहित हुए हम लोग अब एक क्षण भी जीवित रहने के लिए समर्थ नहीं हैं ॥१३८।। हे देव, शीत, आतप, महावायु और वर्षा आदिका उपद्रव आश्रयरहित हम लोगांको दुखी कर रहा है इसलिए आज इन सबके दूर करनेके उपाय कहिए ॥१३९।। हे विभो, आप इस युगके आदि कर्ता हैं और कल्पवृक्षके समान उन्नत हैं, आपके आश्रित हुए हम लोग भयके स्थान कैसे हो सकते हैं ? ॥१४०।। इसलिए हे देव, जिस प्रकार हम लोगोंकी आजीविका निरुपद्रव हो जाये, आज उसी प्रकार उपदेश देनेका ३. दीप्तोषव्यः। [एतद्रूपाः वृक्षाः] । २. जीवनाय । ३.स्वादुः । ४. परिणनन। ५. सन्तापादि । ६. हानेः । ७. जीवितवाञ्छया। ८. जीवितम् । ९. तत् कारणात् । १०. रक्ष । ११. जीवितोपाय । १२. नष्टाः । -मुच्छिन्नाः १०, द०।-मुच्छन्ना: ल०। १३. पितसदशाः। १४. जीवितम् । १५. भवेम । १६. ततः कारणात् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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