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________________ षोडश पर्व कुनितास्तस्य केशान्ता विबभुर्भमरविषः । मनोभुवः शिरमाण सूक्ष्मायो वलयैः समाः ॥११॥ ललाटमष्टमीचन्द्रचारु तस्य दधे रुचिम् । धात्रेव राज्यपट्टस्य निवेशाय पृथूकृतम् ॥१२॥ कुण्डलद्वयसंशोमि तस्य वक्त्रमदीप्यत । सरोरुहमिवोपान्तवर्तिचक्रायुग्मकम् ॥१३॥ नेत्रोत्पलद्वयेनास्य बभौ वक्त्रसरोरुहम् । स्मितांशु'सलिलोत्पीडं लक्ष्म्यावासपवित्रितम् ॥१४॥ विजयच्छन्दहारेण वक्ष-स्थलविलम्बिना । सोऽधान्मरकतागस्य श्रियं निझरशोमिनः ॥१५॥ तस्यांसौ वक्षसः प्रान्ते श्रियमातेनतुः पराम् । द्वीपस्थलस्य पर्यन्ते स्थितौ क्षुद्रनगाविव ॥१६॥ बाहू तस्य महाबाहोरधातां बलमूर्जितम् । यतो बाहुबलीत्यासीत् नामास्य महसां निधेः ॥१७॥ मध्येगात्रमसौदधे गम्भीरं नाभिमण्डलम् । कुलाद्रिरिव पनायाः सेवनीयं महत्सरः॥१८॥ कटीतटं बभावस्य कटिसूत्रेण वेष्टितम् । महाहिनेव विस्तीर्ण तटं मेरोमहोतेः ॥१९॥ कदलीस्तम्मनिर्मासा वूरू तस्य विरेजतुः । लक्ष्मीकरतलाजस्न 'स्पर्शादिव समुज्ज्वलौ ॥२०॥ शुशुभाते शुभे जतस्य विक्रमशालिनः । भविष्यप्रतिमायोगतपःसिद्ध्याता२ गते ॥२१॥ क्रमौ मृदुतलौ तस्य लसदङ्गुलिसदलौ । रुचिं दधतुरारक्तौ रकाम्मोजस्य सश्रियः ॥२२॥ कल्पवृक्षको छोड़कर क्या कहीं अन्यत्र भी पाये जाते हैं ? ॥१॥ उसके भ्रमरके समान काले तथा कुटिल केशोंके अग्रभाग कामदेवके शिरके कवचके सूक्ष्म लोहेके गोल तारोंके समान शोभायमान होते थे ॥११॥ अष्टमीके चन्द्रमाके समान सुन्दर उसका विस्तृत ललाट ऐसी शोभा धारण कर रहा था मानो ब्रह्माने राज्यपट्टको बाँधनेके लिए ही उसे विस्तृत बनाया हो ॥१२॥ दोनों कुण्डलोंसे शोभायमान उसका मुख ऐसा देदीप्यमान जान पड़ता था मानो जिसके दोनों ओर समीप ही चकवा-चकवी बैठे हों-ऐसा कमल ही हो ॥१३॥ मन्द हास्यकी किरणरूपी जलके पूरसे भरा हुआ तथा लक्ष्मीके निवास करनेसे अत्यन्त पवित्र उसका मुखरूपी सरोवर नेत्ररूपी दोनों कमलोंसे भारी सुशोभित होता था ॥१४॥ वह बाहुबली अपने वक्षःस्थलपर लटकते हुए विजयछन्द नामके हारसे निर्झरनों-द्वारा शोभायमान मरकतमणिमय पर्वतकी शोभा धारण करता था ॥१५॥ उसके वक्षःस्थल के प्रान्तभागमें विद्यमान दोनों कन्धे ऐसी शोभा बढ़ा रहे थे मानो किसी द्वीपके पर्यन्त भागमें विद्यमान दो छोटे-छोटे पर्वत ही हों॥१६।। लम्बी भुजाओंको धारण करनेवाले और तेजके भाण्डारस्वरूप उस राजकुमारकी दोनों ही भुजाएँ उत्कृष्ट बलको धारण करती थीं और इसीलिए उसका बाहुबली नाम सार्थक हुआ था॥१७॥ जिस प्रकार कुलाचल पर्वत अपने मध्यभागमें लक्ष्मीके निवास करने योग्य बड़ा भारी सरोवर धारण करता है उसी प्रकार वह बाहुबली अपने शरीरके मध्यमागमें गम्भीर नाभिमण्डल धारण करता था ॥१८॥ करधनीसे घिरा हुआ उसका कटिप्रदेश ऐसा सुशोभित होता था मानो किसी बड़े सर्पसे घिरा हुआ अत्यन्त ऊँचे सुमेरु पर्वतका विस्तृत तट ही हो ॥१९॥ केलेके खम्भेके समान शोभायमान उसके दोनों ऊरु ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो लक्ष्मीकी हथेलीके निरन्तर स्पर्शसे ही अत्यन्त उज्ज्वल हो गये हों ॥२०॥ पराक्रमसे सुशोभित रहनेवाले उस बाहुबलीकी दोनों ही जंघाएँ शुभ थीं-शुभ लक्षणोंसे सहित थीं और ऐसी जान पड़ती थीं मानो वह बाहुबली भविष्यत् कालमें जो प्रतिमायोग तपश्चरण धारण करेगा उसके सिद्ध करनेके लिए कारण ही हों ।।२१।। उसके दोनों ही चरण लालकमलकी शोभा धारण कर रहे थे क्योंकि जिस प्रकार कमल कोमल होता है उसी प्रकार उसके चरणोंके तलवे भी कोमल थे, कमलोंमें जिस प्रकार दल (पँखुरियाँ) सुशोभित होते हैं उसी प्रकार उसके चरणों में अँगुलियाँरूपी दल १. कुटिलीकृताः । २. केशाग्रा-म०, ल । ३. शिरःकवच । ४. लोहवलयः । ५. जलकण-प्रचयम् । ६. पर्वतस्य । ७. तेजसाम् । ८. गभीरं म०, ल०। ९. लक्ष्म्याः । १०. समानो। ११. अनवरत । १२. कारणताम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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