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________________ चतुर्दशं पर्व ३१५ परितः परितस्तार तारास्य नयनावली । रमारमप्रभोरसः भितैर्जवनिकाश्रियम् ॥११२॥ . सलयैः पदविन्यासैः परितो रङ्गमण्डलम् । परिक्रामन्नसौ रेजे विमान, इव काश्यपीम् ॥११३॥ कृतपुष्पाञ्जलेरस्य ताण्डवारम्भसंभ्रमे । पुष्पवर्ष दिवोऽमुखन सुरास्त तितोषिताः ॥११॥ तदा पुष्करवायानि मन्द्रं दध्वनुरक्रमात् । दिक्तटेषु प्रतिध्वानानातन्वानि कोटिशः ॥१५॥ वीणा मधुरमारेणुः कलं वंशा 'विसस्वनुः । गेयान्यनुगतान्येषां समं तालरराणिषुः ॥११६॥ "उपवादकवाद्यानि परिवादकवादितः । बभूवुः संगतान्येव"सांगत्यं हि सयोनिषु ॥१७॥ "काकलोकलमामन्द्रतारमूर्छनमुजगे.। तदोपवीणयन्तीमिः" किचरीमिरनुल्वणम् ॥११॥ ध्वनद्भिर्मधुरं मौख' संबन्धं प्राप्य शिष्यवत् । कृतं वंशोचितवंशः प्रयोगेष्वविवादिभिः ॥१९॥ प्रयुज्य मघवा शुद्धं पूर्वरङ्गमनुक्रमात् । करणैराहारै चित्रं प्रायुक्त तं पुनः ॥२०॥ चित्रैश्च रेचकैः पादकटिकण्ठकराश्रितैः । ननाट ताण्डवं शक्रो दर्शयन् रसमूर्जितम् ॥१२१॥ . करनेवाला इन्द्र के नेत्रोंका समूह ही हो ॥११॥ इन्द्रके बड़े-बड़े नेत्रोंकी पङ्क्ति जवनिका (परदा) की शोभा धारण करनेवाली अपनी फैलती हुई प्रभासे रंगभूमिको चारों ओरसे आच्छादित कर रही थी॥११२॥ वह इन्द्र तालके साथ-साथ पैर रखकर रंगभूमिके चारों ओर घूमता हुआ ऐसा शोभायमान हो रहा था मानो पृथिवीको नाप ही रहा हो ॥११३।। जब इन्द्रने पुष्पाञ्जलि क्षेपण कर ताण्डव नृत्य करना प्रारम्भ किया तब उसकी भक्तिसे प्रसन्न हुए देवोंने स्वर्ग अथवा आकाशसे पुष्पवर्षा की थी॥११४|| उस समय दिशाओंके अन अन्तभाग तक प्रतिध्वनिको विस्तृत करते हुए पुष्कर आदि करोड़ों बाजे एक साथ गम्भीर शब्दोंसे बज रहे थे ॥११५।। वीणा भी मनोहर शब्द कर रही थी, मनोहर मुरली भी मधुर शब्दोंसे बज रही थी और उन बाजोंके साथ-ही-साथ तालसे सहित संगोतके शब्द हो रहे थे ॥११६।। वीणा बजानेवाले मनुष्य जिस स्वर वा शैलीसे वीणा बजा रहे थे, साथके अन्य बाजोंके बजानेवाले मनुष्य भी अपने-अपने बाजोंको उसी स्वर वा शैलीसे मिलाकर बजा रहे थे सो ठीक ही है एक-सी वस्तुओं में मिलाप होना ही चाहिए ॥११७। उस समय वीणा बजाती हुई किन्नरदेवियाँ कोमल, मनोहर, कुछ-कुछ गम्भीर, उच्च और सूक्ष्मरूपसे गा रही थीं ॥११८। जिस प्रकार उत्तम शिष्य गुरुका उपदेश पाकर मधुर शब्द करता है और अनुमानादिके प्रयोगमें किसी प्रकारका वाद-विवाद नहीं करता हुआ अपने उत्तम वंश (कुल) के योग्य कार्य करता है उसी प्रकार वंशी आदि बाँसोंके बाजे भी मुखका सम्बन्ध पाकर मनोहर शब्द कर रहे थे और नृत्यसंगीत आदिके प्रयोगमें किसी प्रकारका विवाद (विरोध) नहीं करते हुए अपने वंश (बाँस) के योग्य कार्य कर रहे थे ॥११९।। इस प्रकार इन्द्रने पहले तो शद्ध (कार्यान्तरसे रहित ) पूर्वरंग का प्रयोग किया और फिर करण (हाथोंका हिलाना तथा अङ्गहार (शरीरका मटकाना) के द्वारा विविधरूपमें उसका प्रयोग किया ॥१२०।। वह इन्द्र पाँव, कमर, कण्ठ और हाथोंको अनेक प्रकारसे घुमाकर उत्तम रस दिखलाता हुआ ताण्डव नृत्य कर रहा था ॥१२१॥ जिस १. 'स्तृञ् आच्छादने । २. स्फुरती। ३. तालमानयुतः। ४. परिभ्रमन् । ५. प्रमाणं कुर्वन् । ६. पृथ्वीम् । ७. इन्द्रभक्ति । ८. चर्मसंबद्धमुखतूर्याणि । 'पुष्करं करिहस्ताने वाद्यभाण्डमुखे जले' ' इत्यभिधानात् । ९. युगपत् । १०. कलवंशाः म०, ल०। ११. वांशाः । १२. प्रबन्धाः। १३. गानं चरित्यर्थः । १४. उप समीपे वदन्तीति उपवादकानि तानि च तानि बाधानि च उपवादकवाद्यानि । १५. वीणाशब्दैः । १६. संयुक्तानि । हृदयङ्गमानि वा । 'संगतं हृदयंगमम्' इत्यभिधानात् । १७. समानधर्मवस्तु । १८. 'काकाली तु कले सूक्ष्मे' इत्यमरः । १९. वीणया उपगायन्तीभिः । २०. अनुत्कटं यथा भवति तथा । २१. मुखाज्जातम् । २२. वेणोरन्वयस्य वोचितम् । २३. विवादमकुर्वद्भिः । २४. करन्यासः । २५. अङ्गविक्षेपः । २६. भ्रमणः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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