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________________ २२ या सेनसंघ नाम से प्रसिद्ध हुबा है। जिनसेन स्वामी के गुरु वीरसेन ने तो अपना वंश' 'पंचस्तूपान्वय' ही लिखा है परन्तु गुणभद्राचार्य ने सेनान्वय लिखा है । इन्द्रनन्दी ने अपने श्रुतावतार में लिखा है कि जो मुनि पंचस्तूप-निवास से आये, उनमें किन्हीं को सेन और किन्हीं को भद्र नाम दिया गया। तथा कोई आचार्य ऐसा भी कहते हैं कि जो गुहाओं से आये उन्हें नन्दी, जो अशोक वन से आये उन्हें देव और जो पंचस्तूप से आये उन्हें सेन नाम दिया गया। श्रुतावतार के उक्त उल्लेख से यह सिद्ध होता है कि सेनान्त और भद्रान्त नाम वाले मुनियों का समूह ही आगे चलकर सेनान्वय या सेनसंघ कहलाने लगा है। वंश-परम्परा वंश दो प्रकार का होता है-एक लौकिक वंश और दूसरा पारमार्थिक वंश । लौकिक वंश का सम्बन्ध योनि से है और पारमार्थिक वंश का सम्बन्ध विद्या से। आचार्य जिनसेन और गुणभद्र के लौकिक वंश का कुछ पता नहीं चलता । आप कहाँ के रहने वाले थे? किसके पुत्र थे? आपकी क्या जाति थी? इसका उल्लेख न इनकी ग्रन्थप्रशस्तियों में मिलता है और न इनके परवर्ती आचार्यों की ग्रन्थ-प्रशस्तियों में । गहवास से विरत साधु अपने लौकिक वंश का परिचय देना उचित नहीं समझते और न उस परिचय से उनके व्यक्तित्व में कुछ महत्व ही आता है। यही कारण रहा कि कुछ को छोड़कर अधिकांश आचार्यों के इस लौकिक वंश का कुछ भी इतिहास सुरक्षित नहीं है। अभी तक के अनुसन्धान से इनके परमार्थ वंश-गुरुवंश-की परम्परा आर्य चन्द्रसेन तक पहुँच सकी है। अर्थात् चन्द्रसेन के शिष्य आर्यनन्दी, उनके वीरसेन, बीरसेन के विनसेन, जिनसेन के गुणभद्र और गुणभद्र के शिष्य लोकसेन थे । यद्यपि आत्मानुशासन के संस्कृत टीकाकार प्रभाचन्द्र ने उपोद्घात में लिखा है कि बड़े धर्मभाई विषयव्यामुग्धबुद्धि लोकसेन को सम्बोध देने के ब्याज से समस्त प्राणियों के उपकारक समीचीन मार्ग को दिखलाने की इच्छा से श्री गुणभद्रदेव ने यह ग्रन्थ लिखा; परन्तु उत्तरपुराण की प्रशस्ति को देखते हुए टीकाकार का उक्त उल्लेख ठीक नहीं मालूम होता क्योंकि उसमें उन्होंने लोकसेन को अपना मुख्य शिष्य बतलाया है। वीरसेन स्वामी के जिनसेन के सिवाय दशरथगुरु नाम के एक शिष्य और थे। श्री गुणभद्रस्वामी ने उत्तरपुराण की प्रशस्ति में अपने आपको उक्त दोनों गुरुओं का शिष्य बतलाया है। इनके सिवाय १. अन्जन्मदिसिस्सेगावकम्मरस बसेजस्स । सहमतुच पंचत्यूहलभामा मुनिना ॥४॥ -धबला पस्तपोवीप्तकिरण व्याम्भोजानि बोधयन् । मोतिष्ट मुनीनेनः पंचस्तूपाम्बयाम्बरे ॥५॥ -जयधवला २. पंचस्तूप्यनिवासादुपागता येऽनमारिणस्तेखु । काश्चिात्सेनाभिल्यान कास्चिश्वभाभिधान.... करोत् ॥६॥ ३. अन्ये जगुर्गुहाया विनिर्गता मन्दिनो महात्मानः । देवारचासोकवनात् पाचस्तूप्यात्ततः सेनः ॥७॥ -इ० श्रुतावतार ४. "बहसमभातुर्लोकसेनस्य विषयल्यामुग्धबुद्धः संबोधमव्याजेम सर्वसस्योपकारकसन्मार्गमुपदर्शयितकामो गणभद्रदेवो निर्विघ्नतः शास्त्रपरिसमाप्त्यादिकं फलमभिलषन्निष्टदेवताबिशेवं नबस्कुर्वन्नाह–'लक्ष्मीनिवासनिलयमिति ।" ५. श्रीवीरसेनमुनिपावपयोजभङ्गः श्रीमानभूद् विनयसेनमुनिर्गरीयान् । तच्चोदितेन जिनसेनमुनीरवरेण काव्यं व्यापि परिवेष्टितमेघदूतम् ॥"
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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