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________________ २५८ आदिपुराणम् खाद् भ्रष्टा रत्नवृष्टिः सा क्षणमुत्प्रेक्षिता जनैः । गर्मति निधीनां किं जगरक्षोभादभूदिति ॥१०॥ खाणे विप्रकीर्णानि रत्नानि क्षणमावभुः । धुशाखिनां फलानीवशातितानि सुरद्विपैः ॥११॥ खाणे गणनातोता रत्नधारा रराज सा । विप्रकोपोंव कालेन तरला तारकावली ॥१२॥ विद्यदिन्द्रायुधे किंचित् जटिले सुरनायकैः । दिवो विगलिते स्यातामित्यसौ क्षणमैक्ष्यत ॥१३॥ किमेषा वैद्युती दीप्तिः किमुत बुसदां युतिः । इति व्योमचरैरैक्षि क्षयमाशङ्कय साम्बरे ॥९॥ सैषा हिरण्मयी वृष्टिनेशेन निपातिता। विभोहिरण्यगर्भवमिव बोधयितुं जगत् ॥१५॥ षण्मासानिति सापतत् पुण्ये नामिनुपालये । स्वर्गावतरणाद् मतुः प्राकसं मुम्नसन्ततिः ॥१६॥ पश्चाच नवमासेषु वसुधारा वा मता । महो महान् प्रमावोऽस्य तीर्थकरवस्य माविनः ॥१७॥ रत्नगर्मा धरा जाता हर्षगर्माः सुरोत्तमाः । क्षोममा गाजमनमो गर्भाधानोरसवें विमोः" ॥९८॥ सिक्का जलकणे महो रस्लैरलंकृता । गर्भाधाने जगहुँ गर्मिणीवामवद् गुरुः ॥१९॥ रस्नः कीर्णा प्रसूनैव सिक्का गन्धाम्बुमिर्वभौ। तदास्नातानुलिप्लेव भूषिताङ्गो धराङ्गना ॥१०॥ अथवा विमानोंसे ज्योतिषी देवोंकी उत्कृष्ट प्रभा ही आ रहो हो ॥८९॥ अथवा आकाशसे बरसती हुई रत्नवृष्टिको देखकर लोग यही उत्प्रेक्षा करते थे कि क्या जगत्में क्षोभ होनेसे निधियोंका गर्भपात हो रहा है ॥२०॥ आकाशरूपी आँगनमें जहाँ-तहाँ फैले हुए वे रत्न क्षणभरके लिए ऐसे शोभायमान होते थे मानो देवोंके हाथियोंने कल्पवृक्षोंके फल ही तोड़-तोड़कर डाले हों ॥९१।। आकाशरूपी आँगनमें वह असंख्यात रत्नोंकी धारा ऐसी जान पड़ती थी मानो समय पाकर फैली हई नक्षत्रोंको चंचल और चमकीली पडक्ति ही हो॥२२॥ अथवा उस रत्न-वर्षाको देखकर क्षणभरके लिए यही उत्प्रेक्षा होती थी कि स्वर्गसे मानो परस्पर मिले हुए बिजली और इन्द्रधनुष ही देवोंने नीचे गिरा दिये हो॥१३॥ अथवा देव और विद्याधर उसे देखकर क्षणभरके लिए यही आशंका करते थे कि यह क्या आकाशमें बिजलीकी कान्ति है अथवा देवोंकी प्रभा है ? ॥९४|| कुबेरने जो यह हिरण्य अर्थात् सुवर्णकी वृष्टि की थी वह ऐसी मालूम होती थी मानो जगत्को भगवान्की 'हिरण्यगर्भता' बतलानेके लिए ही की हो [जिसके गर्भ में रहते हुए हिरण्य-सुवर्णकी वर्षा आदि हो वह हिरण्यगर्भ कहलाता है ] ॥९५।। इस प्रकार स्वामी वृषभदेवके स्वर्गावतरणसे छह महीने पहलेसे लेकर अतिशय पवित्र नाभिराजके घरपर रत्न और सुवर्णकी वर्षा हुई थी ।।९६॥ और इस प्रकार गर्भावतरणसे पीछे भी नौ महीने तक रत्न तथा सुवर्णकी वर्षा होती रही थी सो ठीक ही है क्योंकि होनेवाले तीर्थकरका आश्चर्यकारक बड़ा भारी प्रभाव होता है ।।१७।। भगवान्के गर्भावतरण:उत्सवके समय यह समस्त पृथिवी रत्नोंसे व्याप्त हो गयी थी, देव हर्षित हो गये थे और समस्त लोक क्षोभको प्राप्त हो गया था । भगवान् के गर्भावतरणके समय यह पृथिवी गंगा नदीके जलके कणोंसे सोंची गयी थी तथा अनेक प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत की गयी थी इसलिए वह भी किसी गर्भिणी स्त्रीके समान भारी/हो गयी थी ।।९९।। उस समय रत्न और फूलोंसे व्याप्त तथा सुगन्धित जलसे सींची गयी यह पृथिवीरूपी स्त्री स्नान कर चन्दनका विलेपन लगाये और आभूषणोंसे १. खाद् वृष्टा ल० । भ्रष्टा पतिता। २. स्रुति स्रवः । ३. पातितानि । 'शदल शातने' । ४. घनतां नीते । ५. विद्युत्सम्बन्धिनी। ६. देवानाम् । ७. हिरण्यसमूहः 'हिरण्यं द्रविणं द्युम्नम्'। ८. तथा स०, म०, द०, ल०। ९. आगच्छत् । १०. गर्भादानोत्सवे म०, ल०।११. अयं श्लोकः पुरुदेवचम्पका स्वकीयग्रन्थस्य चतर्थस्तवकस्यैकविंशस्थाने स्थापितः । १२. गर्भादाने म०, ल०। १३. स्नानानुलिप्तेव अ०, ल० । स०, म. पुस्तकयोरुभयथा पाठः।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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