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________________ २३८ मादिपुराणम् इत्यकृत्रिमनिश्शेषपराक्यरचनायिते । तत्रोपपादक्षयने 'पर्वाति स क्षणाद् ययौ ॥२२॥ दोपधातुमलस्पर्शवर्जितं चामलक्षणम् । क्षबादाविरभूतस्य रूपमापूर्णयौवनम् ॥१२॥ अम्कानशोममस्यामाद् वपुरग्याजसुन्दरम् । जोत्सबमानन्बदरतेनेव निर्मितम् ।।१२४॥ शुमाः सुगन्धयः स्निग्धा लोके ये केचनाणवः । तेस्स्व देहनिर्माणमभूत् पुण्यानुमावतः ॥२५॥ पर्याप्स्यनन्तरं सोऽमात् स्वदेहंज्योत्स्नया वृतः । सम्बोसले नमोरले शनीवाखण्डमण्डलः ॥१२॥ *दिम्यहंसः स तत्तपमावसन् क्षणमावमौ । गासैकतमाविम्बचिव सथुवैककः ।।१२०॥ सिंहासनमथाभ्यर्णम लंकुर्वन्न्यमावसी । पराव निषधोत्सब्गमावविध मानुमान् ॥१२८॥ स्वपुण्याम्बुमिरेवायमभ्यषेचि न केवलम् । मलंच च भारीरैगुलेरिय विभूषणः ॥१९॥ सोऽधिवक्षःस्थलं को नजमेव न केवलम् । सहजो दिम्पलदमीच यावदापुरविप्लुताम् ॥१३॥ अस्नातलिप्तदीप्ताङ्गः सहजाम्बरभूषणः । सोऽयुतद् 'पुसदा मूनि धुलोकैकलिलामणिः ॥१३॥ "शुचिस्फटिकनिर्मासिनिर्मलोदारविग्रहः । स बमौ प्रज्वलन्मौलिः पुण्यराभिरिवोच्छिखः ॥१३२॥ किरणोंसे शोभायमान वहाँकी लक्ष्मीका हास्य ही हो ।। १२१ ॥ इस प्रकार अकृत्रिम और श्रेष्ठ रचनासे शोभायमान रहनेवाले उस विमानमें उपपाद शय्यापर वह देव क्षण-भरमें पूर्ण शरीरको प्राप्त हो गया ॥१२२॥ दोष, धातु और मलके स्पर्शसे रहित, सुन्दर लक्षणोंसे युक्त तथा पूर्ण यौवन अवस्थाको प्राप्त हुआ उसका शरीर क्षण-भरमें ही प्रकट हो गया था ।।१२३।। जिसकी शेभा कभी म्लान नहीं होती, जो स्वभावसे ही सुन्दर है और जो नेत्रोंको आनन्द देनेवाला है ऐसा उसका शरीर ऐसा सुशोभित होता था मानो अमृतके द्वारा ही बनाया गयाहो ॥१२४॥ इस संसारमें जो शुभ सुगन्धित और चिकने परमाणु थे, पुण्योदयके कारण उन्हीं परमाणुओंसे उसके शरीरकी रचना हुई थी ।। १२५ ।। पर्याप्ति पूर्ण होनेके बाद उपपाद शय्यापर अपने ही शरीरकी कान्तिरूपी चाँदनीसे घिरा हुआ वह अहमिन्द्र ऐसा सुशोभित होता था जैसा कि आकाशमें चाँदनीसे घिरा हुआ पूर्ण चन्द्रमा सुशोभित होता है ॥१२६।। उस उपपाद शय्यापर बैठा हुआ वह दिव्यहंस ( अहमिन्द्र) क्षण-भर तक ऐसा शोभायमान होता रहा जैसा कि गंगा नदीके बालूके टीलेपर अकेला बैठा हुआ तरुण हंस शोभायमान होता है ॥१२७॥ उत्पन्न होनेके बाद वह अहमिन्द्र निकटवर्ती सिंहासनपर आरूढ़ हुआ था। उस समय वह ऐसा शोभायमान होता था जैसा कि अत्यन्त श्रेष्ठ निषध पर्वतके मध्यपर आश्रित हुआ सूर्य शोभायमान होता है ॥१२८॥ वह अहमिन्द्र अपने पुण्यरूपी जलके द्वारा केवल अभिषिक्त ही नहीं हुआ था किन्तु शारीरिक गुणोंके समान अनेक अलंकारोंके द्वारा अलंकृत भी हुआथा ॥१२९॥ उसने अपने वक्षस्थलपर केवल फूलोंकी माला ही धारण नहीं की थी किन्तु जीवनपर्यन्त नष्ट नहीं होनेवाली, साथ-साथ उत्पन्न हुई स्वर्गकी लक्ष्मी भी धारण की थी ॥१३०॥ स्नान और विलेपनके बिना ही जिसका शरीर सदा देदीप्यमान रहता है और जो स्वयं साथ-साथ उत्पन्न हुए वस तथा आभूषणोंसे शोभायमान है ऐसा वह अहमिन्द्र देवोंके मस्तकपर 1 अप्रमागमें ) ऐसा सुशोभित होता था मानो स्वर्गलोकका एक शिखामणि हो हो अथवा सूर्य ही हो क्योंकि शिखामणि अथवा सूर्य भी स्नान और विलेपनके बिना ही देदीप्यमान रहता है और स्वभावसे ही अपनी प्रभा-द्वारा आकाशको भूषित करता रहता है ॥१३१॥ . . जिसका निर्मल और उत्कृष्ट शरीर शुद्ध स्फटिकके समान अत्यन्त शोभायमान था तथा जिसके मस्तकपर देदीप्यमान मुकुट शोभायमान हो रहा था ऐसा वह अहमिन्द्र, जिसकी शिखा १. स पर्याप्ति क्ष-ब०, द०, स०, म० । २. अनुपाधिमञ्जुलम् । ३. चिक्कणाः । ४. देवश्रेष्ठः । ५. समीपस्थम् । ६. परार्धनिषधो-अ०, ५०, ८०, स०, ल०। ७. सौकुमार्यादिभिः । ८. अबाधाम् । ९. देवानामने। १०. शुद्धः ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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