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________________ २३४ आदिपुराणम् वात्सल्यमधिकं चक्रे स मुनिर्धर्मवत्सलः । विनेबान् स्थापयन् धर्मे जिनप्रवचनाश्रितान् ॥७॥ 'इत्यमूनि महाधैयों मुनिभिरममावयत् । तीर्थकृत्वस्य संप्राप्ती कारणान्येष षोडश ॥७॥ ततोऽमूर्मावनाः सम्यग् भावयन मुनिसत्तमः । स बबन्ध महत् पुण्यं त्रैलोक्यक्षोभकारणम् ॥७९॥ सकोष्ठबुद्धिममलां बीजबुद्धिं च शिश्रिये । पदानुसारिणी बुद्धि संमिश्रोतृतामिति ॥८॥ तामिईदिमिरिदिः परलोकगतागतम् । राजर्षी राजविद्यामिरिव सम्यगबुद्ध सः॥८॥ स दीसतपसा दीप्तो भेजे [भ्रेजे] तप्ततपाः परम् । तेपे तपोऽप्रयमुनं च धोरांघो [होऽ] रातिमर्मभित्॥४२॥ स तपोमन्त्रिमिद्धन्द्वममन्त्रयत मन्त्रवित् । परलोकजयोधुक्तो विजिगीषुः पुरा स्था ८३॥ मणिमादिगुणोपेतां विक्रियर्दिमवाप सः । पदं वाम्छन तामैच्छन महेच्छो गरिमास्पदम ॥८४॥ जल्लायोषधिसंप्राप्तिरस्यासीज्जगत हिता । कल्पद्रमफलावाप्तिः कस्य बानोपकारिणी ॥५॥ रसत्यागप्रतिज्ञस्य रससिद्धिरभून्मुनेः । सूते निवृत्तिरिष्टार्थादधिकं हि महत् फलम् ॥८६॥ (प्रभावित) करता था ॥७६॥ जैनशास्त्रोंके अनुसार चलनेवाले शिष्योंको धर्ममें स्थिर रखता हुआ और धर्म में प्रेम रखनेवाला वह वचनाभि सभी धर्मात्मा जीवोंपर अधिक प्रेम रखता था॥७७॥ इस प्रकार महा धीर-वीर मुनिराज वनाभिने तीर्थकरत्यकी प्राप्तिके कारणभूत उक्त सोलह भावनाओंका चिरकाल तक चिन्तन किया था।॥७८॥ तदनन्तर इन भावनाओंका उत्तम रीतिसे चिन्तन करते हुए उन श्रेष्ठ मुनिराजने तीन लोकमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाली तीर्थकर नामक महापुण्य प्रकृतिका बन्ध किया ॥७९॥ वह निर्मल कोष्ठबुद्धि, बीजबुद्धि, पदानुसारिणीबुद्धि और संमिनश्रोतबुद्धि इन चार ऋद्धियोंको भी प्राप्त हुआ था।८०॥ जिस प्रकार कोई राजर्षि राजविद्याओंके द्वारा अपने शत्रुओंके समस्त गमनागमनको जान लेता है ठीक उसी प्रकार प्रकाशमान ऋद्धियाक धारक वचनाभिमुनिराजने भी ऊपर कही हुई चार प्रकारकी बुद्धि नामक ऋद्वियोंके द्वारा अपने परभव-सम्बन्धी गमनागमनको जान लिया था ॥८१॥ वह दीप्त ऋद्धिके प्रभावसे उत्कृष्ट दीप्तिको प्राप्त हुआ था, तप्त ऋद्धिके प्रभावसे उत्कृष्ट तप तपता था, उप्र ऋद्धिके प्रभावसे उप्र तपश्चचरण करता था और भयानक कर्मरूप शत्रुओंके मर्मको भेदन करता हुआ घोर ऋद्धिके प्रभावसे घोर तप तपता था॥८२॥ मन्त्र (परामर्श)को जाननेवाला वह वजनाभि जिस प्रकार पहले राज्य-अवस्थामें विजयका अभिलाषी होकर परलोक (शत्रसमूह) जो जीतनेके लिए तत्पर होता हआ मन्त्रियोंके साथ बैठकर द्वन्द्र (यट) का विचार किया करता था, उसी प्रकार अब मुनि अवस्थामें भी पन्चनमस्कारादि मन्त्रोंका जाननेवाला, वह वजनामि कर्मरूप शत्रुओंको जीतनेका अभिलाषी होकर परलोक (नरकादि पर्यायोंको, जीतनेके लिए तत्पर होता हुआ तपरूपी मन्त्रियों (मन्त्रशास्त्रके जानकार योगियों के साथ द्वन्द्व (आत्मा और कर्म अथवा राग और द्वेष आदि) का विचार किया करता था।।८। उदार आशयको धारण करनेवाला वजनाभि केवल गौरवशाली सिद्ध पदकी ही इच्छा रखता था। उसे ऋद्धियोंकी बिलकुल ही इच्छा नहीं थी फिर भी अणिमा, महिमा आदि अनेक गुणोंसहित विक्रिया ऋद्धि उसे प्राप्त हुई थी ॥८४|| जगत्का हित करनेवाली जल्ल आदि ओषधि ऋद्धियाँ भी उसे प्राप्त हुई थीं सो ठीक ही है। कल्पवृक्षपर लगे हुए फल किसका उपकार नहीं करते ? ॥८५।। यद्यपि उन मुनिराजके घी, दूध आदि रसों के त्याग करनेकी प्रतिज्ञा थी तथापि घी, दूध आदिको झरानेवाली अनेक रस ऋद्धियाँ प्रकट हुई थीं।सो ठीकही १. इहामूनि ल०। २. सत्तमः श्रेष्ठः । ३. परलोकगमनागमनम् । ४. दीप्ति । ५. चोराधारा-१०। घोरापोराति-ल०। ६. परिग्रहम् । इष्टानिष्टादिकं च । पक्षे कलह च। ७.-जगतीहिता म०, ल.। ८. अमृतादिरससिद्धिः।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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