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________________ २२८ आदिपुराणम् नगयां पुण्डरीकिण्या वज्रसेनस्य भूभुजः । श्रीकान्तायाश्च पुत्रोऽभूद् वज्रनामिरिति प्रभुः ॥९॥ तयोरेव सुता जाता 'वरदत्तादयः क्रमात् । विजयो वैजयन्तश्च जयन्तोऽप्यपराजितः ॥१०॥ तदाभूवंस्तयोरेव प्रियाः पुत्रा महोदयाः । पूर्वोदिष्टाहमिन्द्रास्तेऽप्यभोगवेयकाच्युताः ॥११॥ सुवाहुरहमिन्द्रोऽभूद् यः प्राग्मतिवरः कृती । मानन्दश्च महाबाहुः पीठाहोऽभूदकम्पनः ॥१२॥ महापीठोऽभवत् सोऽपि धनमित्रचरः सुरः । संस्कारैः प्राक्तनैरेव घटनैकत्र देहिनाम् ॥१३॥ नगर्या केशवोऽत्रैव धनदेवाइयोऽभवत् । कुबेरदत्तवाणिजोऽनन्तमत्वाब नन्दनः ॥१४॥ वज्रनामिरथापूर्णयौवनो रुरुचे भृशम् । बालार्क इव निक्षचामीकरसमथुतिः ॥१५॥ विनीलकुटिलैः केशः शिरोऽस्य रुचिमानशे। प्रावृषेच्याम्बुदच्छामिव शृगं महीभृतः ॥१६॥ कुण्डलार्ककरस्पृष्टगण्डपर्यन्तशोभिना । स बमासे मुखाम्जेन पनाकर इवोन्मिपन् ॥१७॥ ललाटादितटे तस्य भूलते रेजतुस्तराम् । नेत्रांशुपुष्पमा मधुपायिततारया ॥१८॥ कामिनीनेत्रभृङ्गालिमाकर्षन् मुखपङ्कजम् । स्वामोदमाविरस्याभूत् स्मितकेशरनिर्गमम् ॥१९॥ कान्स्यासवमिवापातुमापतन्त्यतृपत्तराम् । जनतानेत्रभृझाली तन्मुखाजे विकासिनि ॥२०॥ नासिकास्य रुचिं दधे नेत्रयोर्मध्यवर्तिनी । सीमेव रचिता पात्रा तयोः क्षेत्रानतिक्रमे ॥२१॥ स्थित पुष्कलावती देशकी पुण्डरीकिणी नगरीमें वनसेन राजा और श्रीकान्ता नामकी रानीके वजनाभि नामका समथे पुत्र उत्पन्न हुआ।।८-९॥ पहले कहे हुए व्याघ्र आदिके जीव वरदत्त आदि भी क्रमसे उन्हीं राजा-रानीके विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित नामके पुत्र हुए ॥१०॥ जिनका वर्णन पहले किया जा चुका है ऐसे मतिवर मन्त्री आदिके जीव जो अधोप्रैवेयकमें अहमिन्द्र हुए थे वहाँसे च्युत होकर उन्ही राजा-रानीके सम्पत्तिशाली पुत्र हुए ॥११॥ जो पहले (वनजंघके समयमें) मतिवर नामका बुद्धिमान मन्त्री था वह अधोवेयकसे च्युत होकर उनके सुबाहु नामका पुत्र हुआ। आनन्द पुरोहितका जीव महाबाहु नामका पुत्र हुआ। सेनापति अकम्पनका जीव पीठ नामका पुत्र हुआ और धनमित्र सेठका जीव महापीठ नामका पुत्र हुआ। सो ठीक ही है, जीव पूर्वभवके संस्कारोंसे ही एक जगह इकट्ठे होते हैं ॥१२-१३।। श्रीमतीका जीव केशव, जो कि अच्युत स्वर्गमें प्रतीन्द्र हुआ था वह भी वहाँसे च्युत होकर इसी नगरीमें कुबेरदत्त वणिक्के उसकी स्त्री अनन्तमतीसे धनदेव नामका पुत्र हुआ॥१४॥ . अथानन्तर जब वजनाभि पूर्ण यौवन अवस्थाको प्राप्त हुआ तब उसका शरीर तपाये हुए सुवर्णके समान अतिशय देदीप्यमान हो उठा और इसीलिए वह प्रातःकालके सूर्यके समान बड़ा ही सुशोभित होने लगा ॥१५॥ अत्यन्त काले और टेढ़े बालोंसे उसका शिर ऐसा सुशोभित होता था जैसा कि वर्षा ऋतुके बादलोंसे ढका हुआ पर्वतका शिखर ॥१६॥ कुण्डलरूपी सूर्यकी किरणोंके स्पर्शसे जिसके कपोलोंका पर्यन्त भाग शोभायमान हो रहा है ऐसे मुखरूपी कमलसे वह वचनाभि फले हए कमलोंसे सुशोभित किसी सरोवरके समान शोभायमान हो रहा था ॥१७॥ उसके ललाटरूपी पर्वतके तटपर दोनों भौंहरूपी लताएँ नेत्रोंकी किरणोंरूपी पुष्पमंजरियों और तारेरूप भ्रमरोंसे बहुत ही अधिक शोभायमान हो रही थीं ॥१८॥ उसका मुख श्वासोच्छ्वासकी सुगन्धिसे सहित था, मुसकानरूपी केशरसे युक्त था और स्त्रियोंके नेत्ररूपी भ्रमरोंका आकर्षण करता था इसलिए ठीक कमलके समान जान पड़ता था ॥१९॥ सदा विकसित रहनेवाले उसके मुख-कमलपर जनसमूहके नेत्ररूपी भ्रमरोंकी पंक्ति मानो कान्तिरूपी आसवको पीनेके लिए ही सब ओर आकर झपटती थी और उसका पान कर अत्यन्त तृप्त होती थी ॥२०॥ दोनों नेत्रोंके मध्यभागमें रहनेवाली उसकी नाक ऐसी १ शार्दूलार्यचरवरदत्त-वराहार्यचरवरसेन-गोलाङ्गलायंचरचित्राङ्गद-नकुलार्यचरप्रशान्तमदनाः। २.मतिबरादिवसः। ३. -प्यभूत् ल०, म । ४. प्रावृषि भवः । ५. विकसन् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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