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________________ २०१ नवमं पर्व 'प्रतीहि धर्मसर्वस्वं दर्शनं चारुदर्शन । तस्मिबाप्ते दुरापाणि न सुखानीह देहिनाम् ॥१२९॥ लब्धं तेनैव सज्जन्म स कृतार्थः स पण्डितः । परिस्फुरति निर्व्याजं यस्य सदर्शनं हृदि ।।१३०॥ सिदिप्रसादसोपानं विदि दर्शनमग्रिमम् । दुर्गतिद्वारसंरोधि कवाटपुटमूर्जितम् ॥१३॥ स्थिरं धर्मतरोर्मूलं द्वारं स्वर्मोक्षवेश्मनः । शीलाभरणहारस्य तरल तरलोपमम् ॥१३२॥ अलंकरिष्णु रोचिष्णु रखसारमनुत्तरम् । सम्यक्त्वं हृदये धत्स्व मुक्तिश्रोहारविभ्रमम् ॥१३३॥ सम्यग्दर्शनसतं येनासादि दुरासदम् । सोऽचिरान्मुक्किपर्यन्तां "सुखतातिमवाप्नुयात् ॥१३॥ लब्धसदर्शनो जीवो मुहर्तमपि पश्यायः । संसाररूतिकां छिरवा कुरुते हासिनोमसौ ॥१३५॥ सुदेवस्वसुमानुष्ये जन्मनी तस्य नेतरत् । दुर्जन्म जायते जातु हृदि यस्यास्ति दर्शनम् ॥१३६॥ किंवा बहमिरालापैः इलाधैवास्तु दर्शने । कन्धेन येन संसारो यात्यनम्तोऽपि सान्तताम् ॥१३७॥ तत्वं जैनेश्वरीमाज्ञामस्मद्वाक्यात् प्रमाणयन् । अनन्यशरणो मत्स्वा प्रतिपयस्व दर्शनम् ॥१३॥ उत्तमानमिवानेषु नेत्रद्वयमिवानने । मुक्त्यङ्गेषु प्रधानाजमाताः सदर्शनं विदुः ॥१३९॥ पाषण्ड, मूढ़ता इन तीन मूढ़ताओंको छोड़ क्योंकि मूढताओंसे अन्धा हुआ प्राणी तत्त्वोंको देखता हुआ भी नहीं देखता ॥१२८॥ हे आर्य, पदार्थके ठीक-ठीक स्वरूपका दर्शन करनेवाले सम्यग्दर्शनको ही तू धर्मका सर्वस्व समझ, उस सम्यग्दर्शनके प्राप्त हो चुकनेपर संसारमें ऐसा कोई सख नहीं रहता जो जीवोंको प्राप्त नहीं होता हो ॥१२९।। इस संसारमें उसी पुरुषने श्रेष्ठ जन्म पाया है, वही कृतार्थ है और वही पण्डित है जिसके हृदयमें छलरहित-वास्तविक सम्यग्दर्शन प्रकाशमान रहता है ॥१३०॥ हे आर्य, तू यह निश्चित जान कि यह सम्यग्दर्शन मोक्षरूपी महलकी पहली सीढ़ी है। नरकादि दुर्गतियोंके द्वारको रोकनेवाले मजबूत किवाड़ हैं, धर्मरूपी वृक्षको स्थिर जड़ है, स्वर्ग और मोक्षरूपी घरका द्वार है और शीलरूपी रमहारके मध्यमें लगा हुआ श्रेष्ठ रत्न है ।।१३१-१३२।। यह सम्यग्दर्शन जीवोंको अलंकृत करनेवाला है, स्वयं देदीप्यमान है, रत्नोंमें श्रेष्ठ है, सबसे उत्कृष्ट है और मुक्तिरूपी लक्ष्मीके हारके . समान है । ऐसे इस सम्यग्दर्शनरूपी रत्नहारको हे भव्य, तू अपने हृदयमें धारण कर ॥१३३।। जिस पुरुषने अत्यन्त दुर्लभ इस सम्यग्दर्शनरूपी श्रेष्ठ रनको पा लिया है वह शीघ्र ही मोक्ष तकके सुखको पा लेता है ।।१३४॥ देखो, जो पुरुष एक मुहूर्त के लिए भी सम्यग्दर्शन प्राप्त कर लेता है वह इस संसाररूपी बेलको काटकर बहुत ही छोटी कर देता है अर्थात् वह अर्द्ध पुद्गल परावर्तनसे अधिक समय तक संसारमें नहीं रहता ।।१३५।। जिसके हृदयमें पग्दर्शन विद्यमान है वह उत्तम देव और उत्तम मनुष्य पर्यायमें ही उत्पन्न होता है। उसके नारकी और तिर्यञ्चोंके खोटे जन्म कभी भी नहीं होते ॥१३६।। इस सम्यग्दर्शनके विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ ? इसकी तो यही प्रशंसा पर्याप्त है कि सम्यग्दर्शनके प्राप्त होनेपर अनन्त संसार भी सान्त (अन्तसहित) हो जाता है ॥१३७॥ हे आर्य, तू मेरे कहनेसे अर्हन्त देवकी आज्ञाको प्रमाण मानता हुआ अनन्यशरण होकर अन्य रागी द्वेषी देवताओंकी शरणमें न जाकर सम्यग्दर्शन स्वीकार कर ॥१३८॥ जिस प्रकार शरीरके हस्त, पाद आदि अंगोंमें मस्तक प्रधान है और मुखमें नेत्र प्रधान है उसी प्रकार मोक्षके समस्त अंगोंमें गण १. जानीहि । २. चारुदर्शनम् ब०,०, १०,म०, स०,ला। ३. प्राप्ते सति । ४. दुर्लभानि । ५. कवाटपट- म०, ल०। ६. कान्तिमत् । ७. तरलोपलम् ब...। मध्यमणिः 'उपलो रत्नपाषाणी उपला शर्करापि च' इति । 'तरलो हारमध्यगः' इत्यमरः । 'हारमध्यस्थितं रत्नं तरलं नायकं विदुः' इति हलायुधः । ८. शोभाम् । ९. प्राप्तम् । १०. सुखपरम्पराम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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