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________________ १९२ आदिपुराणम् कुन्देन्दीवरमन्दारसान्द्रामोदाभितालिनि । चित्रमितिगतानेकरूपकर्ममनोहरे ॥२३॥ 'वासगेहेऽन्यदा विश्वे तसे सुदुनि हारिरि । गासैकतनिर्मासि दुकूल 'प्रच्छदोज्ज्वले ॥२॥ प्रियास्तनतटस्पर्शसुखामीलितलोचनः । मेरुकन्दरमाश्लिष्यन् स विबुदिव वारिदः ॥२५॥ तत्र वातायनद्वारपिधानाल्बधूनके । केशसंस्कारधूपोचमेन क्षणमूछितौ ॥२६॥ निरुदोच्छवासदौःस्थित्यादन्त: किचिदिवाकली। दम्पती सौ निशामध्ये दीर्घनिद्रामपेयतः ॥२७॥ जीवापाये तयोर्देही क्षणाद् विच्छायतां गतौ। प्रदीपापायसंवृद्ध तमस्कन्धौ वथा गृहौ ॥२८॥ वियुतासुरसौ छायां न लेभे सहकान्तया । पर्यस्त इव कालेन सलतः कल्पपासा गर॥ मोगा नापि भूपेन तयोरासीत् परासुता'। घिगिमान् मोगि भोगाभान् मोगा प्राणापहारिणः॥३०॥ तौ तथा" सुखसाइतौ संमोगैरुपलालितः । प्राप्तावेकपदे शोच्यां दनां घिसंसतिस्थितिम् ॥३३॥ मोगारिपि जन्तूनां यदि चेदीरशी दशा । जनाः किमेमिरस्वन्सैः कुहतासमते रतिम् ॥३२॥ सुगन्धित हो रहा था, मणिमय दीपकोंके प्रकाशसे उसका समस्त अन्धकार नष्ट हो गया था। जिनके प्रत्येक पायेमें रत्न जड़े हुए हैं ऐसे अनेक मंचोंसे वह शोभायमान था। उसमें जो चारों ओर मोतियोंके गुच्छे लटक रहे थे उनसे वह ऐसा मालूम होता था मानो हँस ही रहा हो । कुन्द, नीलकमल और मन्दार जातिके फूलोंकी तीव्र सुगन्धिके कारण उसमें बहुत-से भ्रमर आकर इकडे हुए थे। तथा दीवालोंपर बने हुए तरह तरह-तरहके चित्रोंसे वह अतिशय शोभायमान हो रहा था ॥२१-२४॥ श्रीमतीके स्तनतटके स्पर्शसे उत्पन्न हुए सुखसे जिसके नेत्र निमीलित (बन्द) हो रहे हैं ऐसा वह वनजंघ मेरु पर्वतकी कन्दराका स्पर्श करते हुए बिजलीसहित बालके समान शोभायमान हो रहा था ॥२५॥ शयनागारको सुगन्धित बनाने और केशोंका संस्कार करनेके लिए उस भवनमें अनेक प्रकारका सुगन्धि धूप जल रहा था। भाग्यवश उस दिन सेवक लोग झरोखेके द्वार खोलना भूल गये थे इसलिए वह धूम उसी शयनागारमें रुकता रहा। निदान, केशोंके संस्कारके लिए जो धूप जल रहा था उसके उठते हुए धूमसे वे दोनों पति-पत्नी क्षण-भरमें मूच्छित हो गये ॥२६।। उस धूमसे उन दोनोंके श्वास रुक गये जिससे अन्तःकरणमें उन दोनोंको कुछ व्याकुलता हुई । अन्तमें मध्य रात्रिके समय वे दोनों ही दम्पति दीर्घ निद्राको प्राप्त हो गये-सदाके लिए सो गये-मर गये ॥२७॥ जिस प्रकार दीपक बुझ जानेपर रुके हुए अन्धकारके समूहसे मकान नियम-मलीन हो जाते हैं, उसी प्रकार जीव निकल जानेपर उन दोनोंके शरीर क्षण भरमें निषम-मलीन हो गये ॥२८॥ जिस प्रकार समय पाकर उखड़ा हुआ कल्पवृक्ष लतासे सहित होनेपर भी शोभायमान नहीं होता उसी प्रकार प्राणरहित वनजंघ श्रीमतीके साथ रहते हुएभीशोभायमान नहीं होरहा था ॥२९॥ यद्यपि वहधूप उनके भोगोपभोगका साधन था तथापि उससे उनकी मृत्यु हो गयी इसलिए सपके फणाके समान प्राणोंका हरण करनेवाले इन भोगोंको धिक्कार हो ॥३०॥ जो श्रीमती और वनजंघ उत्तम-उत्तम भोगोंका अनुभव करते हुए हमेशा सुखी रहते थे वे भी उस समय एक ही साथ सोचनीय अवस्थाको प्राप्त हुए थे इसलिए संसारकी ऐसी स्थितिको धिक्कार हो ॥३१॥ हे भव्यजन, जब कि भोगोपभोगके साधनोंसे ही जीवोंकी ऐसी अवस्था हो जाती है तब अन्तमें दुःख देनेवाले इन भोगोंसे क्या प्रयोजन है ? इन्हें छोड़कर जिनेन्द्रदेवके वीतराग मतमें ही प्रीति करो ॥३२॥ १.चित्रकर्म । २. शम्यागहे। ३. सदृश । ४. प्रच्छलो-म.ल.। ५. संरुख-म०, द्र., ल.। ६. विष्वस्तः । ७. भोगकारणेन । ८. धूमेन प० । ९. मृतिः। १०. सर्पशरीर । ११. तदा ब०, म., स., क.। १२. सुखाधीनो। १३. तत्क्षणे । 'सहसैकपदे सबोऽकस्मात् सपदि तत्क्षणे इत्यभिधान-चिन्तामणिः। १४. दुःखान्तः।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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