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________________ सप्तमं पर्व जीवशब्दोऽयमभ्रान्तं बाघमर्थमपेक्षते । संज्ञास्वाल्लौकिक भ्रान्ति मतहेस्वादिशब्दवत् ॥७५॥ इत्यादियुक्तिमिर्जीवं तत्त्वं स निरणीनयत् । तावपि ज्ञानजं गर्वमुनिसत्वा नेमतुर्मुनिम् ॥४६॥ गुरोस्तस्यैव पाश्वें तो गृहीत्वा परमं तपः । सुदर्शनमधाचाम्सवईनं चाप्युपोषतुः ॥७॥ निदानं वासुदेवत्वे म्यवाद् विकसितोऽप्यमुत् । कालान्ते तावजायेता महाशुकसुरोत्तमौ ॥७॥ इन्द्रप्रतीन्द्रपदयोः षोडशाब्ध्युपमस्थिती । तो तत्र सुखसाङ्गतावन्वभूतां सुरभिवम् ॥७॥ स्वाबुरन्ते ततश्च्युत्वा धातकोखण्डगोचरे। विदेहे पुष्कलावस्यां पश्चिमाईपुरोगते ॥८॥ विषये पुण्डरीकिण्या पुर्या राहो धनंजयात् । जबसेनायमस्वस्योः देयोबत्यासितक्रमौ ॥८॥ जज्ञाते तनयो रामकेशवस्थानमागिनौ। ज्यायान् महावलोऽन्याख्यातोऽतिवलसंज्ञया ॥८२॥ राज्यान्ते केशवेऽतीते तपस्तप्त्वा महाबलः । पावें समाधिगुप्तस्य प्राणतेन्द्रस्ततोऽभवत् ॥८॥ भुक्त्वामरी श्रियं तत्र विंशत्यन्ध्युपमात्यये । धातकीखण्डपबाई पुरोवर्सिविदेहगे ॥८॥ विषये वत्सकावत्यां प्रभाकर्याः पुरः" प्रमोः । महासेनस्य भूमर्तुः प्रतापानतविद्विषः ॥४५॥ देयां वसुन्धराख्यायां जयसेनाइयोऽजनि । प्रजानां जनितानन्दश्चन्द्रमा इव नन्दनः ॥८६॥ क्रमाचक्रधरो भूत्वा प्रजाः स चिरमन्वशात् । विरक्तधीन मोगेषु प्रवज्यामाईतीं श्रितः ॥८॥ जीव शब्द अभ्रान्त बाह्य पदार्थकी अपेक्षा रखता है क्योंकि वह संज्ञावाचक शब्द है। जो-जो संज्ञावाचक शब्द होते हैं, वे किसी संज्ञासे अपना सम्बन्ध रखते हैं जैसे लौकिक घट आदि शब्द, भ्रान्ति शब्द, मत शब्द और हेतु आदिशब्द। इत्यादि युक्तियोंसे मुनिराजने जीवतत्वका निर्णय किया. जिसे सुनकर उन दोनों विद्वानोंने शानका अहंकार छोड़कर मुनिको नमस्कार किया ।।७५-७६। उन दोनों विद्वानोंने उन्हीं मुनिके समीप उत्कट तप ग्रहण कर सुदर्शन और आचाम्लवर्द्धन व्रतोंके उपवास किये जा विकसितने नारायण पद प्राप्त होनेका निदान भी किया। आयुके अन्तमें दोनों शरीर छोड़कर महाशुक्र स्वर्गमें इन्द्र और प्रतीन्द्र पदपर सोलह सागर प्रमाण स्थितिके धारक उत्तम देव हुए। वे वहाँ सुख में तन्मय होकर स्वर्ग-लक्ष्मीका अनुभव करने लगे ।।७८-७९|| अपनी आयुके अन्तमें दोनों वहाँसेचयकर धातकीखण्ड द्वीपके पश्चिम भागसम्बन्धी पूर्व विदेह क्षेत्रमें पुष्कलावती देशकी पुण्डरीकिणी नगरीमें राजा धर्मजयकी जयसेना और यशस्वतीरानीके बलभद्र और नारायणका पद धारण करनेवाले पुत्र उत्पन्न हुए। अब उत्पत्तिकी अपेक्षा दोनोंके क्रममें विपर्यय हो गया था। अर्थात् बलभद्र ऊर्ध्वगामी था और नारायण अधोगामी था। बड़े पुत्रका नाम महाबल था और छोटेका नाम अतिबल था (महाबल प्रहसितका जीव था और अतिबल विकसितका जीव था) ॥८०-८२॥ राज्यके अन्तमें जब नारायण अतिबलको आयु पूर्ण होगवी तब महाबलने समाधिगुप्त मुमिराजके पास दीक्षा लेकर अनेक तप तपे, जिससे आयुके अन्तमें शरीर छोड़कर वह प्राणत नामक चौदहवें स्वर्गमें इन्द्र हुआ॥८३॥ वहाँ वह बीस सागर तक देवोंकी लक्ष्मीका उपभोग करता रहा। बायु पूर्ण होनेपर वहाँ से चयकर धातकीखण्ड द्वीपके पश्चिम भागसम्बन्धी पूर्वविदेह क्षेत्रमें स्थित वत्सकावती देशकी प्रभाकरी नगरीके अधिपति तथा अपने प्रतापसे समस्त शत्रुओंको नम्र करनेवाले महासेन राजाकी वसुन्धरा नामक रानीसे जयसेन नामका पुत्र हुभा। वह पुत्र चन्द्रमाके समान समस्त प्रजाको आनन्दित करता था ।।८४-८६॥ अनुक्रमसे उसने चक्रवर्ती १. वाचकत्वात् । २. लौकिक घटमानयेत्यादि । ३. भ्रान्तमतहत्वादि-म.-भ्रान्ति मत-१०, स.। -प्रान्तमतं हेत्वादि-द०, ल०। इष्टाभिप्रायः। ४. धूलित्वादित्यादिशब्दवत् । ५. निश्चयमकारयत्। ६.मज्ञानी। -प्यसत् द०। -प्यभूत् ल०। ७. सुखाचीनौ। ८. पूर्वदिगते। १. अनुल्कतिक्रमो 'ऊळगाम्यपोगामिनी' इति 'द'पुस्तके । १०. पूर्वदिग्वति । ११. पुरस्य ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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