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________________ ११० आदिपुराणम् गजदन्तायोऽस्यैते 'लक्ष्यन्ते पादसंमिताः। भक्त्या निषधनीलाभ्यामिव हस्ताः प्रसारिताः ॥१०॥ इमे चैनं महानयौ सीतासीतोदकाहये । कोशद्वयादनास्पृश्य यातोऽम्भोधि भयादिव ॥१८॥ मस्य पर्यन्तभूमागं सदाऽलंकुरुते प्रमैः । मशालपरिक्षेपः कुरुरुक्ष्मीमधिक्षिपन् ॥१८॥ इतो नन्दनमुचानमितं सौमनसं वनम् । इतः पाण्डकमामाति शश्वस्कुसुमितमम् ॥१८३॥ इतो चन्द्रवृत्तानाः कुरवोऽमी चकासते। इतो जम्बदमः श्रीमानितः शाल्मलिपादपः ॥१८४॥ अमी चैत्यगृहा मान्ति बनेध्वस्य जिनेशिनाम् । रत्नभामासिमिः कूटः थोतयन्तो नमोऽङ्गणम् ॥५८५॥ शश्वत् पुण्यजनाकीर्णः सोचानः सजिनालयः । पर्यन्तस्थसरिक्षेत्रो नगोऽयं नगरायते ॥१८॥ संगतस्याभृद्भङ्गः क्षेत्रपत्रोपशोभिनः । जम्बद्वीपाम्बुजस्यास्य नगोऽयं कर्णिकायते ॥१८॥इति प्रकटितोदारमहिमा भूभृतां पतिः । मन्ये जगत्त्रयायाममवाप्येष विलइते ॥१४॥ तमिस्यावर्णयन् दूरात् स्वयंबुदः समासदत् । ध्वजहस्तैरिवाहृतः सादरं जिनमन्दिरैः ॥१८९॥ अकृत्रिमाननाघन्तान नित्यालोकान् सुराचिंतान् । जिनालयान् समासाच स परां मुदमाययौ ॥१९०॥ 'सपर्यया स 'पर्यस्य भूयो भक्त्या प्रणम्य च । मद्रशालादिचैत्यानि वन्दते स्म यथाक्रमम् ॥१९॥ वर्ती छोटी-छोटी पर्वतश्रेणियाँ) यहाँसे लेकर निषध और नील पर्वत तक चले गये हैं सो ठीक ही है क्योंकि बड़ोंकी चरणसेवा करनेवाला कौन पुरुष बड़प्पनको प्राप्त नहीं होता ? ॥१७९॥ इसके चरणों (प्रत्यन्त पर्वतों)के आश्रित रहनेवाले ये गजदन्त पर्वत ऐसे जान पड़ते हैं मानो निषध और नील पर्वतने भक्तिपूर्वक सेवाके लिए अपने हाथ ही फैलाये हों ॥१८०॥ ये सीता, सीतोदा नामकी महानदियाँ मानो भयसे ही इसके पास नहीं आकर दो कोशकी दूरीसे समुद्रकी ओर जा रही हैं ॥१८१॥ इस पर्वतके चारों ओर यह भद्रशाल वन है जो अपनी शोभासे देवकुरु तथा उत्तरकुरुकी शोभाको तिरस्कृत कर रहा है और अपने वृक्षों के द्वारा इस पर्वतसम्बन्धी चारों ओरके भूमिभागको सदा अलंकृत करता रहता है ।।१८२।। इधर नन्दनवन, इधर सौमनस वन और इधर पाण्डुक वन शोभायमान है। ये तीनों ही वन सदा फूले हुए वृक्षोंसे अत्यन्त मनोहर हैं १८३॥ इधर ये अर्धचन्द्राकार देवकुरु तथा उत्तरकुरु शोभायमान हो रहे हैं, इधर शोभावान् जम्बूवृक्ष है और इधर यह शाल्मली वृक्ष है ।।१८। इस पर्वतके चारों वनोंमें ये जिनेन्द्रदेवके चैत्यालय शोभायमान हैं जो कि रनोंकी कान्तिसे भासमान अपने शिखरोंके द्वाग आकाशरूपी ऑगनको प्रकाशित कर रहे हैं ।।१८। यह पर्वत सदा पुण्यजनों (यक्षों) से व्याप्त रहता है। अनेक बाग-बगीचे तथा जिनालयोंसे सहित है तथा इसके समीप ही अनेक नदियाँ और विदेह क्षेत्र विद्यमान हैं इसलिए यह किसी नगरके समान मालूम हो रहा है। क्योंकि नगर भी सदा पुण्यजनों (धर्मात्मा लोगों) से व्याप्त रहता है, बाग-बगीचे और जिन-मन्दिरोंसे सहित होता है तथा उसके समीप अनेक नदियाँ और खेत विद्यमान रहते हैं ।।१८६।। अथवा यह पर्वत संसारी जीवरूपी भ्रमरोंसे सहित तथा भरतादि क्षेत्ररूपी पत्रोंसे शोभायमान इस जम्बूद्वीपरूपी कमलकी कर्णिकाके समान भासित होता है ।।१८७। इस प्रकार उत्कृष्ट महिमासे युक्त यह सुमेरु पर्वत, जान पड़ता है कि आज भो तीनों लोकोंकी लम्बाईका उल्लंघन कर रहा है ॥१८८। इस तरह दूरसे ही वर्णन करता हुआ स्वयम्बुद्ध मन्त्री उस मेरु पर्वतपर ऐसा जा पहुँचा मानो जिनमन्दिरोंने अपने ध्वजारूपीहाथोंसे उसे आदरसहित बुलाया ही हो ।।१८।।वहाँ अनादिनिधन, हमेशा प्रकाशित रहनेवाले और देवोंसे पूजित अकृत्रिम चैत्यालयोंको पाकर वह स्वयंबुद्ध मन्त्री परम आनन्दको प्राप्त हुआ ॥१९०।। उसने पहले प्रदक्षिणा दी। फिर भक्तिपूर्वक बार-बार नमस्कार किया और फिर पूजा की । इस प्रकार यथाक्रमसेभद्रशाल आदि वनोंको समस्त अकृत्रिम १. लक्षन्ते ल । २. भक्त्यै द०, ट० । भजनाय । ३. गच्छतः । ४. परिवलयः । परिक्षेपं स०,०। ५.तिरस्कुर्वन् । अधिक्षिपत् अ०, अ०।६.भद्रशालादुपरि । ७.सन्ततप्रकाशकान् । ८.पूजया। ९.प्रदक्षिणीकृत्य ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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