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________________ पञ्चमं पर्व 'तौ देहौ यत्र तं विद्धि परलोकमसंशयम् । तद्वांश्च परलोकी स्यात् प्रेत्यभावफलोपभुक ॥१९॥ जात्यनुस्मरणाजीवगतागतविनिश्चयात् । आप्तोक्तिसंभवाच्चैव जीवास्तित्वविनिश्चयः ॥७॥ अन्यप्रेरितमेतस्य शरीरस्य विचेष्टितम् । हिताहितामिसंधा नाद्यन्त्रस्येव विचेष्टितम् ॥७१॥ चैतन्यं भूतसंयोगाद् यदि चेत्थं प्रजायते । पिठरे रन्धनायाधिश्रिते स्यात्तत्समुद्भवः ॥७२॥ इत्यादिभूतवादीष्टमतदूषणसंभवात् । मूर्खप्रलपितं तस्य मतमित्यवधीर्यताम् ॥७३॥ "विज्ञप्तिमात्रसंसिद्धिर्न विज्ञानादिहास्ति ते। साध्यसाधनयोरैक्यात् कुतस्तत्त्वविनिश्चितिः ॥७॥ विज्ञानव्यतिरिक्तस्य वाक्यस्यह प्रयोगतः । बहिरर्थस्य संसिद्धिर्विज्ञानं तद्वचोऽपि चेत् ॥७५॥ "किं केन साधितं"तत्स्यान्मूर्खविज्ञप्तिमात्रकम् । कुतो ग्राह्यादिभेदोऽपि "विज्ञानक्ये निरंशके ॥७६॥ जहाँ यह जीव अपने अगले-पिछले शरीरोंसे युक्त होता है वहीं उसका परलोक कहलाता है और उन शरीरोंमें रहनेवाला आत्मा परलोकी कहा जाता है तथा वही परलोकी आत्मा परलोकसम्बन्धी पुण्य-पापोंके फलको भोगता है ॥६९॥ इसके सिवाय, जातिस्मरणसे जीवन-मरणरूप आवागमनसे और आप्तप्रणीत आगमसे भी जीवका पृथक् अस्तित्व सिद्ध होता है ।।७०॥ जिस प्रकार किसी यन्त्रमें जो हलन-चलन होता है वह किसी अन्य चालककी प्रेरणासे होता है। इसी प्रकार इस शरीरमें भी जो यातायातरूपी हलन-चलन हो रहा है वह भी किसी अन्य चालककी प्रेरणासही हो रहा है वह चालक आत्मा ही है। इसके सिवाय शरीरकी जो चेष्टाएँ होती हैं सो हित-अहितके विचारपूर्वक होती हैं-इससे भी जीवका अस्तित्व पृथक् जाना जाता है. ॥७१।। यदि आपके कहे अनुसार पृथिवी आदि भूतचतुष्टयके संयोगसे जीव उत्पन्न होता है तो भोजन पकानेके लिए आगपर रखी हुई बटलोई में भी जीवकी उत्पत्ति हो जानी चाहिए क्योंकि वहाँ भी तो अग्नि, पानी, वायु और पृथिवीरूप भूतचतुष्टयका संयोग होता है ॥७२॥ इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि भूतवादियोंके मतमें अनेक दूषण हैं इसलिए यह निश्चय समझिए कि भूतवादियोंका मत निरे मूखौंका प्रलाप है उसमें कुछ भी सार नहीं है ।।७।। ___इसके अनन्तर स्वयंबुद्धने विज्ञानवादीसे कहा कि आप इस जगत्को विज्ञान मात्र मानते हैं--विज्ञानसे अतिरिक्त किसी पदार्थका सद्भाव नहीं मानते परन्तु विज्ञानसे हो विज्ञानकी सिद्धि नहीं हो सकती क्योंकि आपके मतानुसार साध्य, साधन दोनों एक हो जाते हैं-विज्ञान ही साध्य होता है और विज्ञान ही साधन होता है । ऐसी हालतमें तत्त्वका निश्चय कैसे हो सकता है? ॥७४|| एक बात यह भी है कि संसारमें बाद्यपदार्थोकी सिद्धि वाक्योंके प्रयोगसे ही होती है। यदि वाक्योंका प्रयोग न किया जाये तो किसी भी पदार्थकी सिद्धि नहीं होगी और उस अवस्थामें संसारका व्यवहार बन्द हो जायेगा। यदि वह वाक्य विज्ञानसे भिन्न है तो वाक्योंका प्रयोग रहते हुए विज्ञानाद्वैत सिद्ध नहीं हो सकता। यदि यह कहो कि वे वाक्य भी विज्ञान ही हैं तो हे मूर्ख, बता कि तूने 'यह संसार विज्ञान मात्र है' इस विज्ञानाद्वैतकी सिद्धि किसके द्वारा की है ? इसके सिवाय एक बात यह भी: विचारणीय है कि जब तू निरंश निर्विभाग विज्ञानको ही मानता है तब ग्राह्य आदिका भेदव्यवहार किस प्रकार सिद्ध हो सकेगा ? भावार्थ-विज्ञान पदार्थोंको जानता है इसलिए १. देहौ नौ अ०, द०, स०, प० । तो पूर्वोत्तरौ । २. अभिप्रायात् । ३. स्थाल्याम् । ४. पचनाय । ५. चार्वाकस्य। ६. अवज्ञोक्रियताम् ।-धार्यताम् म०, ल०। ७. विज्ञानाद्वैतवादिनं प्रति वक्ति । ८. विज्ञानम् । ९. विज्ञप्तिप्रतिपादकस्य । १०. किं किं न प० । ११. विज्ञानम् । १२. विज्ञानाद्वैते ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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