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________________ ९५ पचमं पर्व 3 ॥४४॥ ततो विज्ञानसन्तान 'व्यतिरिक्तो न कश्चन । जीवसंज्ञः पदार्थोऽस्ति प्रेत्यभावफलोपभुक् ॥४२॥ * तदमुत्रात्मनो दुःखजिहासार्थं प्रयस्यतः । टिट्टिभस्येव' मीतिस्ते गगनादापतिष्यतः ॥४३॥ इत्युदीर्यं स्थिते तस्मिन् मन्त्रो शतमतिस्ततः । नैरात्म्यवादमालम्ब्य प्रोवाचेत्थं विकत्थनः शून्यमेव जगद्विश्वमिदं मिथ्यावभासते । भ्रान्तेः स्वप्नेन्द्रजालादौ हस्त्यादिप्रतिभासवत् ||४५|| ततः कुतोऽस्ति 'वो जीवः परलोकः कुतोऽस्ति वा । असत्सर्वमिदं यस्मात् गन्धर्वनगरादिवत् ॥४६॥ अतोऽमी परलोकार्थं तपोऽनुष्ठानतत्पराः । वृथैव क्लेशमायान्ति परमार्थानभिज्ञकाः ||४७|| धर्मारम्भे यथा यद्वद् दृष्ट्वा मल्मरीचिकाः । जलाशयानुधावन्ति तद्वद्भोगार्थिनोऽप्यमी ||४६८ || अनेक क्षणस्थायी मानना चाहिए जो कि आपने माना नहीं है। पूर्व क्षणमें अनुभूत पदार्थका द्वितीयादि क्षण प्रत्यक्ष होनेपर जो जोड़रूप ज्ञान होता है उसे प्रत्यभिज्ञान कहते हैं । उक्त प्रश्नका समाधान इस प्रकार है- क्षणभंगुर पदार्थमें जो प्रत्यभिज्ञान आदि होता है वह वास्तविक नहीं है किन्तु भ्रान्त है । जिस प्रकारकी काटे जानेपर फिरसे बढ़े हुए नखों और केशोंमें 'ये वे ही नख केश हैं' इस प्रकारका प्रत्यभिज्ञान भ्रान्त होता है || ४१ || [संसारी स्कन्ध दुःख कहे जाते हैं । वे स्कन्ध विज्ञान, वेदना, संज्ञा, संस्कार और रूपके भेदसे पाँच प्रकारके कहे गये हैं । पाँचों इन्द्रियाँ, शब्द आदि उनके विषय, मन और धर्मायतन (शरीर ) ये बारह आयतन हैं । जिस आत्मा और आत्मीय भावसे संसारमें रुलानेवाले रागादि उत्पन्न होते हैं उसे समुदय सत्य कहते हैं । 'सब पदार्थ क्षणिक हैं' इस प्रकारकी क्षणिक नैरात्म्यभावना मार्ग सत्य है तथा इन स्कन्धोंके नाश होनेको निरोध अर्थात् मोक्ष कहते हैं ||४१ || ] इसलिए विज्ञानको सन्तानसे अतिरिक्त जीव नामका कोई पदार्थ नहीं है जो कि परलोकरूप फलको भोगनेवाला हो ||४२ || अतएव परलोकसम्बन्धी दुःख दूर करनेके लिए प्रयन्न करनेवाले पुरुषोंका परलोकभय वैसा ही है जैसा कि टिटिहरीको अपने ऊपर आकाशके पड़नेका भय होता है ||४३|| इस प्रकार विज्ञानवादी सम्भिन्नमति मन्त्री जब अपना अभिप्राय प्रकट कर चुप हो गया तब अपनी प्रशंसा करता हुआ शतमति नामका चौथा मन्त्री नैरात्म्यवाद ( शून्यवाद ) का आलम्बन कर नीचे लिखे अनुसार कहने लगा ||४४ || यह समस्त जगत् शून्यरूप है । इसमें नर, पशु-पक्षी, घट-पट आदि पदार्थोंका जो प्रतिभास होता है वह सब मिथ्या है। भ्रान्ति से ही वैसा प्रतिभास होता है जिस प्रकार स्वप्न अथवा इन्द्रजाल आदिमें हाथी आदिका मिया प्रतिभास होता है || ४५|| इसलिए जब कि सारा जगत् मिथ्या है तब तुम्हारा माना हुआ जीव कैसे सिद्ध हो सकता है और उसके अभावमें परलोक भी कैसे सिद्ध हो सकता है ? क्योंकि यह सब गन्धर्वनगरकी तरह असत्स्वरूप है ॥४६॥ | अतः जो पुरुष परलोकके लिए तपश्चरण तथा अनेक अनुष्ठान आदि करते हैं वे व्यर्थ ही क्लेशको प्राप्त होते हैं। ऐसे जीव यथार्थज्ञानसे रहित हैं ||४७|| जिस प्रकार ग्रीष्मऋतु में मरुभूमिपर पड़ती हुई सूर्यकी चमकीली किरणोंको जल समझकर मृग व्यर्थ ही दौड़ा करते हैं उसी प्रकार ये भोगाभिलाषी मनुष्य परलोकके सुखोंको सच्चा सुख समझकर व्यर्थ ही दौड़ा करते हैं १. भिन्नः । २. मृतोत्पत्तिः । ३. उत्तरभवे । ४. हातुमिच्छाये । ५. प्रयत्नं कुर्वतः । ६. कोयष्टिकस्य । ७. आत्मश्लाघावान् । ८. वा म०, क० । ९. यथा गन्धर्वनगरादयः शून्या भवन्ति तथैवेत्यर्थः । ★ कोष्टकके अन्तर्गत भाग केवल 'ब और क' प्रतिके आधारपर है।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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