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________________ पञ्चमं पर्व कदाचिदय तस्याऽऽसीद् वर्षवृद्धिदिनोत्सवः । मङ्गलैगीतवादिनृत्यारम्मैश्च संभृतः ॥१॥ सिंहासने तमासीनं तदानीं खचराधिपम् । दुधुवुश्चामरैर्वारनार्यः क्षीरोदपाण्डुरैः ॥२॥ मदनममञ्जयों लावण्याम्भोधिवीचयः । सौन्दर्यकलिका रेजुस्तरुण्यस्तत्समीपगाः ॥३॥ पृथुवक्षःस्थलच्छन्न पर्यन्तै मकुटोज्ज्वलैः । खगेन्द्रः परिवत्रेऽसौ गिरिराज इवाद्रिभिः ॥४॥ तस्य वक्षःस्थले हारो नीहारांशुसमद्युतिः । बमासे हिमवत्सानौ प्रपतन्निव निझरः ॥५॥ तदक्षसि पृथाविन्द्रनीलमध्यमणिर्बभौ । कण्ठिका हंसमालेव ब्योम्नि दात्यूहमध्यगा ॥६॥ मन्त्रिणश्च तदामात्यसेनापतिपुरोहिताः। श्रेष्टिनोऽधिकृताश्चान्ये तं परीस्यावतस्थिरे ॥७॥ स्मितैः संभाषितैः स्थानैर्दानैः संमाननैरपि । तानसौ तर्पयामास वीक्षितैरपि सादरैः ॥८॥ स गोष्ठीर्भावयन् भूयो गन्धर्वादिकलाविदाम् । स्पर्द्धमानाश्च तान् पश्यन्नुप श्रोतृसमक्षतः ॥९॥ सामन्तप्रहितान् दूतान् द्वाःस्थैरानीयमानकान् । संभावयन् यथोक्तेन संमानेन पुनः पुनः ॥१०॥ तदनन्तर, किसी दिन राजा महाबलकी जन्मगाँठका उत्सव हो रहा था । वह उत्सव मंगलगीत, वादित्र तथा नृत्य आदिके आरम्भसे भरा हुआ था ॥१॥ उस समय विद्याधरोंके अधिपति राजा महाबल सिंहासनपर बैठे हुए थे। अनेक वारांगनाएँ उनपर क्षीरसमुद्रके समान श्वेतवर्ण चामर ढोर रही थीं ॥२॥ उनके समीप खड़ी हुई वे तरुण स्त्रियाँ ऐसी मालूम होती थीं मानो कामदेवरूपी वृक्षकी मंजरियाँ ही हों, अथवा सौन्दर्यरूपी सागरकी तरंगें ही हों अथवा सुन्दरताकी कलिकाएँ ही हों ॥३॥ अपने-अपने विशाल वक्षःस्थलोंसे समीपके प्रदेशको आच्छादित करनेवाले तथा मुकुटोंसे शोभायमान अनेक विद्याधर राजा महाबलको घेरकर बैठे हुए थे। उनके बीचमें बैठे हुए महावल ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो अनेक पर्वतोंसे घिरा हुआ या उनके बीच में स्थित सुमेरु पर्वत हो हो। ॥४॥ उनके वक्षःस्थलपर चन्द्रमाके समान उज्ज्वल कान्तिका धारक-श्वेत हार पड़ा हुआ था जो कि हिमवत् पर्वतके शिखरपर पड़ते हुए झरनेके समान शोभायमान हो रहा था ॥५॥ जिस प्रकार विस्तृत आकाशमें जलकाकके इधर-उधर चलती हुई हंसोंकी पंक्ति शोभायमान होती है उसी प्रकार राजा महाबलके विस्तीर्ण वक्षःस्थलपर इन्द्रनीलमणिसे सहित मोतियोंकी कण्ठी शोभायमान हो रही थी॥६॥ उस समय मन्त्री, सेनापति, पुरोहित, सेठ तथा अन्य अधिकारी लोग राजा महाबलको घेरकर बैठे हुए थे ॥७॥ वे राजा किसीके साथ हँसकर, किसीके साथ सम्भाषण कर, किसीको स्थान देकर, किसीको दान देकर, किसीका सम्मान कर और किसीकी ओर आदरसहित देखकर उन समस्त सभासदोंको सन्तुष्ट कर रहे थे ॥८॥ वे महाबल संगीत आदि अनेक कलाआंके जानकार विद्वान् पुरुषोंकी गोष्ठोका बार-बार अनुभव करते जाते थे। तथा श्रोताओंके समक्ष कलाविद् पुरुष परस्परमें जो स्पर्धा करते थे उसे भी देखते जाते थे। इसी बीच में सामन्तों-द्वारा भेजे हुए दूतोंको द्वारपालोंके हाथ बुलवाकर उनका बार-बार यथायोग्य १. जननदिवसक्रियमाणोत्सवः । २. धुनन्ति स्म । धून कम्पने । ३. आच्छादितः । ४.-मुकुटो अ०।' ५. चन्द्रः । ६. कृष्णपक्षिविशेषः । ७. वीक्षणः । ८. सम्यादि ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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