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________________ आदिपुराणम् विषादमयदैन्यादिहानेः सिद्धास्पदोपमम् । क्षमाधारतया वातवलयस्थितिमुद्हत् ।।१५६॥ निःसंगत्वादिवाभ्यस्तपरमाणुविचेष्टितम् । निर्वाणसाधनस्वाच्च रत्नत्रयभिवामलम् ।।१५७॥ सोऽत्युदारगुणं भूरितेजोभासुरमूर्जितम् । पुण्यं जैनेश्वरं रूपं दधत्तेपे चिरं तपः ॥१५८।। ततः कृताभिषेकोऽसौ बलशाली महाबलः । राज्यमारं दधे नम्रखेचराभ्यचिंतक्रमः ॥१५९।। स दैवबलसंपन्नः कृतधीरविचेष्टितः । दोर्बलं प्रथयामास संहरन् द्विषतां बलम् ॥१६॥ मन्त्रशक्त्या प्रतिध्वस्त सामर्थ्यास्तस्य विद्विषः । महाहय इवाभूवन् विक्रियाविमुखास्तदा ॥१६॥ तस्मिन्नारूढमाधुयें दधुः प्रीतिं प्रजाइशः । चूतम इव स्वादुसुपक्वफलशालिनि ॥१६२।। नात्यर्थमभवत्तीक्ष्णो न चाति मृदुतां दधे । मध्यमा वृत्तिमाश्रित्य स जगद्वशमानयत् ॥१६॥ 'उभयेऽपि द्विषस्तेन शमिता भूतिमिच्छता । कालादौद्धत्यमायाता जलदेनेव पासवः ॥१६॥ सिद्धिर्धर्मार्थकामानां नाबाधिष्ट परस्परम् । तस्य प्रयोगनैपुण्याद् बन्धूभूयमिवागताः ॥१६५।। शोभायमान था । अथवा यों कहिए कि वह तपश्चरण भविष्यत्कालमें सुखका कारण होनेसे गुरुओंके सद्वचनोंके समान था। निश्चित निवास स्थानसे रहित होनेके कारण पक्षियोंके मण्डलके समान था । विषाद, भय, दीनता आदिका अभाव हो जाने से सिद्धस्थान-मोक्षमन्दिरके समान था । क्षमा-शान्तिका आधार होनेके कारण (पक्षमें पृथिवीका आधार होनेके कारण) वातवलयकी उपमाको प्राप्त हुआ-सा जान पड़ता था। तथा परिग्रहरहित होनेके कारण पृथक रहनेवाले परमाणुके समान था। मोक्षका कारण होनेसे निर्मल रत्नत्रयके तुल्य था। अतिशय उदार गुणोंसे सहित था, विपुल तेजसे प्रकाशमान और आत्मबलसे संयुक्त था ॥१५३-१५८।। इस प्रकार अतिबलके दीक्षा ग्रहण करनेके पश्चात् उसके बलशाली पुत्र महाबलने राज्यका भार धारण किया। उस समय अनेक विद्याधर नम्र होकर उसके चरणकमलोंकी पूजा किया करते थे ॥१५९।। वह महाबल दैव और पुरुषार्थ दोनोंसे सम्पन्न था, उसकी चेष्टाएँ वीर मानवके समान थीं तथा उसने शत्रुओंके बलका संहार कर अपनी भुजाओंका बल प्रसिद्ध किया था ॥१६०।। जिस प्रकार मन्त्रशक्तिके प्रभावसे बड़े-बड़े सर्पसामर्थ्यहीन होकर विकारसे रहित हो जाते हैं-वशीभूत हो जाते हैं उसी प्रकार उसकी मन्त्रशक्ति (विमर्शशक्ति) के प्रभावसे बड़े-बड़े शत्र सामर्थ्यहीन होकर विकारसे रहित (वशीभूत) हो जाते थे ॥१६१।। जिस प्रकार स्वादिष्ट और पके हुए फलोंसे शोभायमान आम्रवृक्षपर प्रजाकी प्रेमपूर्ण दृष्टि पड़ती है उसी प्रकार माधुर्य आदि अनेक गुणोंसे शोभायमान राजा महाबलपर भी प्रजाकी प्रेमपूर्ण दृष्टि पड़ा करती थी॥१६२।। वह न तो अत्यन्त कठोर था और न अतिशय कोमलताको ही धारण किये था किन्तु मध्यम वृत्तिका आश्रय कर उसने समस्त जगत्को वशीभूत कर लिया था ॥१६३।। जिस प्रकार ग्रीष्म कालके आश्रयसे उड़ती हुई धूलिको मेघ शान्त कर दिया करते हैं उसी प्रकार समृद्धि चाहनेवाले उस राजाने समयानुसार उद्धत हुए-गर्वको प्राप्त हुए अन्तरंग(काम,क्रोध,मद, मात्सर्य, लोभ और मोह) तथा बाह्य दोनों प्रकारके शत्रुओंको शान्त कर दिया था।॥१६४॥ उस राजाके धर्म, अर्थ और काम, परस्परमें किसीको बाधा नहीं पहुँचाते थे-वह समानरूप १. क्षान्तेराधारत्वेन, पक्षे क्षितेराधारत्वेन । २. मुद्वहन् अ०, स०, म०, ल०। ३. अभ्यस्तं परमाणोविचेष्टितं येन । ४. तपश्चकार । ५.निष्पन्नबुद्धिः । कृतधीर्वीरवेष्टितः १०.। वीरचेष्टितः ल० ।-६. परिध्वस्त-अ०, द०, स०, म०, प० । ७ धृतप्रियत्वे । 'स्वादुप्रियो च मधुरावित्यभिधानात् । ८. बाह्याभ्यन्तर. शत्रवः । 'अयक्तितः प्रणोताः कामक्रोधलोभमानमदहर्षाः क्षितीशामन्तरङ्गोऽरिषड्वर्गः । ९. बन्धुत्वम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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