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________________ ७९ चतुर्थ पर्व यो वितत्य' पृथुश्रेणीद्वयं पक्षद्वयोपमम् । समुत्पित्सुरिवाभाति नाकलक्ष्मीदिदृक्षया ॥११॥ यस्य सानुषु रम्येषु किन्नराः सुरपन्नगाः । रम्यमाणाः सुचिरं विस्मरन्ति निजालयान् ॥१२॥ यदीया राजतीमित्तीः शरन्मेधावली श्रिता। व्यज्यते शीकरासारैः स्तनितैश्चलितैरपि ॥१३॥ यस्तुङ्गैः शिखरैर्धत्ते देवावासान् स्फुरन्मणीन् । चूडामणीनिवोदप्रान् सिद्धायतनपूर्वकान् ॥९४॥ दधात्युच्चैः स्वकूटानि मुकुटानीव भूमिभृत् । परार्ध्यरत्नचित्राणि यः श्लाघ्यानि सुरासुरैः ॥९५॥ गुहाद्वयं च यो धत्ते हटद्वज्रकवाटकम् । स्वसारक्षननिक्षेपमहादुर्गमिवायतम् ॥१६॥ उत्संगादेत्य नीलाद्रेर्गङ्गासिन्धू महापगे । विशुद्धस्वादलङ्ग्यस्य यस्य पादान्तमाश्रिते ॥९॥ यस्तटोपान्तसं रूढवनराजीपरिष्कृतः । नीलाम्बरधरस्योच्चैर्धत्ते लाङ्गलिनः श्रियम् ॥१८॥ वनवेदों समुत्तुङ्गां यो बिमर्त्यमितो वनम् । रामणीयकसीमानमिव केनापि निर्मिताम् ॥१९॥ संचरत्खचरीपादनूपुरारावकर्षक: । यत्र गन्धवहो वाति मन्दं 'मन्दारबीथिषु ॥१०॥ यः पूर्वापरकोटीभ्यां दिकतटानि विघयन् । स्वगतं वक्तिमाहात्म्यं जगद्गुरुमरक्षमम् ॥१०॥ प्रकार दीर्घ तपस्याके कारण उन मुनियों के नख भी बड़े होते हैं और सिंह जिस प्रकार धीर होता है उसी प्रकार वे मुनि भी अत्यन्त धोर वीर हैं ॥१०॥ वह पर्वत अपनी दोनों श्रेणियोंसे ऐसा मालूम होता है मानो दोनों पंखे फैलाकर स्वर्गलोककी शोभा देखनेकी इच्छासे उड़ना ही चाहता हो ॥९१॥ उस पर्वतके मनोहर शिखरोंपर किन्नर और नागकुमार जातिके देव चिरकाल तक क्रीड़ा करते-करते अपने घरोंको भी भूल जाते हैं ।।१२।। उस पर्वतकी रजतमयी सफेद दीवालोंपर आश्रय लेनेवाले शरद्ऋतुके श्वेत बादलोंका पता लोगोंको तब होता है जब कि वे छोटी-छोटी बूंदोंसे बरसते हैं, गरजते हैं और इधर-उधर चलने लगते हैं ॥१३॥ वह पर्वत अपने ऊँचे-ऊँचे शिखरों-द्वारा देवोंके अनेक आवासोंको धारण करता है। वे आवास चमकीले मणियोंसे युक्त हैं और उस पर्वतके चूणामणिके समान मालूम होते हैं । उन शिखरोंपर अनेक सिद्धायतन (जैनमन्दिर ) भी बने हुए हैं ।।१४।। वह विजयापर्वतरूपी राजा मुकुटोंके समान अत्यन्त ऊँचे कूटोंको धारण करता है। वे मुकुट अथवा कूट महामूल्य रत्नोंसे चित्र-विचित्र हो रहे हैं तथा सुर और असुर उनकी प्रशंसा करते हैं ।।९५।। वह पर्वत देदीप्यमान वञमय कपाटोंसे युक्त दरवाजोंको धारण करता है जिससे ऐसा मालूम होता है मानो अपने सारभूत धनको रखने के लिए लम्बे-चौड़े महादुर्ग-किलेको धारण कर रहाहो।१६।। वह पर्वत अत्यन्त विशुद्ध और अलाय है इसलिए ही मानो गङ्गा सिन्धु नामकी महानदियोंने नीलगिरिकी गोदसे (मध्य भागसे) आकर उसके पादों-चरणों-अथवा समीपवर्ती शाखाओंका आश्रय लिया है ॥१७॥ वह पर्वततटके समीप खड़े हुए अनेक वनोंसे शोभायमान है इसलिए नीलवस्त्रको पहने हुए बलभद्रकी उत्कृष्ट शोभाको धारण कर रहा है ।।९८॥ वह पर्वत वनके चारों ओर बनी हुई ऊँची वनवेदीको धारण किये हुए है जिससे ऐसा मालूम होता है मानो किसीके द्वारा बनायी गयी सुन्दर सीमा अथवा सौन्दर्यकी अवधिको ही धारण कर रहा हो ।।१९।। उस पर्वतपर कल्पवृक्षोंके मध्यमार्गसे सुगन्धित वायु हमेशा धीरेधीरे बहता रहता है, उस वायुमें इधर-उधर घूमनेवाली विद्याधरियोंके नूपुरोंका मनोहर शब्द भी मिला होता है ॥१००। वह पर्वत अपनी पूर्व और पश्चिमकी कोटियोंसे दिशाओंके किनारों १. विस्तारं कृत्वा । २. समुत्पतितुमिच्छुः । ३. प्रकटीक्रियते । ४. चलनः । ५. राजा। ६. कपाटकम अ०, द०, स०, ५०, ल०। ७. समुत्पन्न । ८. बनस्य अभितः। ९. आकर्षकः। १०. कल्पवक्ष । ११. जगतो महाभरक्षमम् ।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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