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________________ आदिपुराणम् मृच्चालिन्यजमार्जारशुकककशिलाहिमिः । गोहंसमहिषच्छिनघटदंशजलौककैः ॥३९॥ श्रोतारः समभावाः स्युरुत्तमाधममध्यमाः । अन्यारशोऽपि सन्स्येव तरिक तेषामियत्तया ॥१४॥ गोहंससदशान् प्राहुरुत्तमान् मृच्छुकोपमान् । मध्यमान् विदुरन्यैश्च समकक्ष्योऽधमो मतः ॥१४॥ शेमुष्यन्दतुलादण्डनिकषोपलसचिमाः। श्रोतारः सत्कथारलपरीक्षाध्यक्षका मताः ॥ १४२॥ अनुसार दृष्टान्तोंकी कल्पना की जाती है ॥ १३८॥ मिट्टी, चलनी, बकरा, बिलाव, तोता, बगुला, पाषाण, सर्प, गाय, हंस, भैसा, फूटा घड़ा, डाँस और जोंक इस प्रकार चौदह प्रकारके श्रोताओंके दृष्टान्त समझना चाहिए। भावार्थ-(१) जैसे मिट्टी पानीका संसर्ग रहते हुए कोमल रहती है, बादमें कठोर हो जाती है । इसी प्रकार जो श्रोता. शाम सुनते समय कोमलपरिणामी हों परन्तु बादमें कठोरपरिणामी हो जायें वे मिट्टीके समान श्रोता हैं । (२) जिस प्रकार चलनी सारभूत आटेको नीचे गिरा देती है और छोकको बचा रखती है उसी प्रकार जो श्रोता वक्ताके उपदेशमें से सारभूत तत्त्वको छोड़कर निःसार तत्त्वको ग्रहण करते हैं वे चलनीके समान श्रोता हैं। (३) जो अत्यन्त कामी हैं अर्थात् शास्त्रोपदेशके समय श्रृंगारका वर्णन सुनकर जिनके परिणाम शृंगार रूप हो जावें वे अजके समान श्रोता हैं। (४) जैसे अनेक उपदेश मिलनेपर भी बिलाव अपनी हिंसक प्रवृत्ति नहीं छोडता, सामने आते ही चहेपर आक्रमण कर देता है उसी प्रकार जो श्रोता बहुत प्रकारसे समझानेपर भी क्रूरताको नहीं छोड़ें, अवसर आनेपर क्रूर प्रवृत्ति करने लगें वे मार्जारके समान श्रोता हैं। (५) जैसे तोता स्वयं अज्ञानी है दूसरोंके द्वारा कहलानेपर ही कुछ सीख पाता है वैसे ही जो श्रोता स्वयं ज्ञानसे रहित हैं दूसरोंके बतलानेपर ही कुछ शब्द मात्र ग्रहण कर पाते हैं वे शुकके समान श्रोता हैं। (६). जो बगुलेके समान बाहरसे भद्रपरिणामी मालूम होते हों परन्तु जिनका अन्तरङ्ग अत्यन्त दुष्ट हो वे बगुलाके समान श्रोता हैं। (७) जिनके परिणाम हमेशा कठोर रहते हैं तथा जिनके हृदयमें समझाये जानेपर जिनवाणी रूप जलका प्रवेश नहीं हो पाता वे पाषाणके समान श्रोता हैं। (८) जैसे साँपको पिलाया हुआ दूध भी विषरूप हो जाता है वैसे ही जिनके सामने उत्तमसे-उत्तम उपदेश भी खराब असर करता है वे सर्पके समान श्रोता हैं। (९) जैसे गाय तृण खाकर दूध देती है वैसे ही जो थोड़ा-सा उपदेश सुनकर बहुत लाभ लिया करते हैं वे गायके समान श्रोता हैं । (१०) जो केवल सार वस्तुको ग्रहण करते हैं वे हंसके समान श्रोता हैं । (११) जैसे भैंसा पानी तो थोड़ा पीता है पर समस्त पानीको गँदला कर देता है । इसी प्रकार जो श्रोता उपदेश तो अल्प ग्रहण करते हैं परन्तु अपने कुतकोंसे समस्त सभामें क्षोभ पैदा कर देते हैं वे भैंसाके समान श्रोता हैं। (१२) जिनके हृदयमें कुछ भी उपदेश नहीं ठहरे वे छिद्र घटके समान श्रोता हैं। (१३) जो उपदेश तो बिलकुल ही ग्रहण न करें परन्तु सारी सभाको व्याकुल कर दें वे डाँसके समान श्रोता हैं। (१४) जो गुण छोड़कर सिर्फ अवगुणोंको ही ग्रहण करें वे जोंकके समान श्रोता हैं। इन ऊपर कहे हुए श्रोताओंके उत्तम, मध्यम और अधमके भेदसे तीन-तीन भेद होते हैं। इनके सिवाय और भी अन्य प्रकारके श्रोता हैं परन्तु उन सबकी गणनासे क्या लाभ है ? ।। १३९-१४० ।। इन श्रोताओंमें जो श्रोता गाय और हंसके समान हैं वे उत्तम कहलाते हैं, जो मिट्टी और तोताके समान हैं उन्हें मध्यम जानना चाहिए और बाकीके समान अन्य सब श्रोता अधम माने गये हैं ।।१४१।। जो श्रोता नेत्र, दर्पण, तराजू और कसौटीके समान गुण-दोषोंके बतलानेवाले हैं वे सत्कथारूप १. तथाक्ष्यब्द-द०, स०, अ०, प०, ल०।
SR No.090010
Book TitleAdi Puran Part 1
Original Sutra AuthorJinsenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages782
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size27 MB
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