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________________ गुण के सरूप ही ते द्रव्य परजाय है है, केवलीउकतिधुनि' ऐसे करि गावे है। द्रव्य गुण दोऊ परजाय ही में पाइयतु, द्रव्य ही में गुण परजाय ये कहावे है । या एक-एक में अनेक सिद्धि होत महा स्यादवाद द्वारि गुरुदेव यो बताये है। कहे 'दीपचंद पद आदि देके को सुनो, आप पद लखें भवि भवपार पावे है । ।७४ ।। एक गुण सेती दूजे गुण सों लगाय भेद, सधत अनंतवार सात भंग नीके हैं। एक-एक गुण सेती अनंता अनंतवार, साधत अनंत लगि लगें नाहिं फीके हैं । अनंता अनंतवार एक-एक गुण सेती, साधिए सपतभंग' भेदिये सुही के हैं। यातै चिदानंद में अनादिसिद्ध सुद्धि महा, पूरण अनंत गुण 'दीप' लखे जीके हैं ।। ७५ ।। गुण एक-एक जाके परजै अनंत कहे, परजै में अनंतानंत नाना विसत है । नाना में अनंत थट थट में अनंत कला, कला जु अखंडित अनंतरूप धर्यो है। रूप में अनंत सत्ता सत्ता में अनंत भाव, भाव को लखाब हू अनंत रस भर्यो है । रस के सुभाव में प्रभाव है अनंत 'दीप' सहज अनंत यो अनंत लगि कर्यो है । । ७६ ।। १ परमात्मा की दिव्यध्वनि, २ भव्य जीव, ३ भले, सम्यक् ४ स्वादहीन, नीरस, ५ सप्त भंग, ६ स्वंय ही के, ७ जीव के पर्याय, ६ घाट ७७
SR No.090008
Book TitleAdhyatma Panch Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipchand Shah Kasliwal, Devendramuni Shastri
PublisherAntargat Shree Vitrag Vigyan Swadhyay Mandir Trust
Publication Year
Total Pages205
LanguageBraj
ClassificationBook_Devnagari, Spiritual, & Religion
File Size2 MB
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