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________________ योगचन्द्रिका टीका सूत्र २३८ वक्तव्यताद्वारनिरूपणम् ता वोध्या । अत्रापि'आख्यायते' इत्यादि क्रियापदानामर्थः पूर्ववत् यथायोग्य धिया कल्पनीय इति । तथा-स्वसमयपरसमयवक्तव्यता एवं विज्ञेया, यथाहि खलु वक्तव्यतायां स्वसमयः परसमयश्च आख्यायते यावत उपदयते । यथा'आगारमावसंता वा आरण्णा वावि पन्नइया। इमं दरिसणमावन्ना, सबदुक्खा विमुच्चई' ॥ गया-आगारमावसन्तो वा आरण्या वाऽपि मनजिताः । इदं दर्शनमापन्नाः सर्वदुःखेभ्यो विमुच्यन्ते ॥इति ॥ अयमर्थ:-आगारं गृहम् आवसन्ता-गृहस्था इत्यर्थः, वा=अथवा आरण्याः तापक्तव्यता परसेमयवक्तव्यता है, ऐसा जानना चाहिये। यहां पर भी आख्यायते' आदि क्रियापदों का अर्थ पूर्व के जैसा याथायोग्य द्धि से लगा लेना चाहिये। (से कि तं ससमयपरसमयवत्तव्यया ?) है भदन्त ! स्वसमय परखमयवक्तव्यता क्या है ? उत्तर--(संसपेयपरसभयवत्तव्वया ) स्वसमयपरसमयवक्तव्यता इस प्रकार से है-(अथणं ससमयपरसमए आविज्जइ, जाव उवदंसिजइ-से तं सलमयपरसमयवेत्तव्यथा) जिस वक्तव्यता में स्वसिद्धान्त और परसिद्धांतका कथन आदि हो वह स्वसमयपरसमयवक्तव्यता है । जैसे 'आगारमावसंता इत्यादि इलोक दारा सिद्धान्त दिखलाया गया है। इसमें यह प्रकट किया गया है, कि-'जो व्यक्ति घर में रहते हैं अर्थात् આવેલ હોય યાવત્ ઉપદર્શિત કરવામાં આવેલ હોય એવી તે વકતવ્યતા, परसभयतव्यता छ, आम नसे. सही मधु 'आख्यायते' વગેરે ક્રિયાપદને અર્થે પૂર્વની જેમ યથાયોગ્ય પોતાની બુદ્ધિવડે બેસાડી a . (से किं तं ससमयपरसमय वचव्वया ?) महन्त ! २५समय પરસમય વકતવ્યતા શું છે? उत्तर-(ससमयपरसमयवत्तव्वया) २५समय ५२समय तव्यता या प्रभा छ-(जत्थ गं ससमयपरसमयं आधविज्जइ, जाय उवदंसिज्जइ-से त असमयपरसमयवत्तव्यया) २ १३तव्यतामा स्वसिद्धान्त भने पसिद्धांतनु Yथत वगैरे डाय, ते ५१समय ५२समय तिव्यता छ. २ 'आगारमावसंता' वगेरे ४ १3 सिद्धान्त मतावामा मावत छ. मामा माट કરવામાં આવેલ છે કે “જે માણસ ઘરમાં રહેતા હોય, તેઓ ગુહસ્થ
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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