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________________ अनुयोगद्वारसूत्रे समुद्राः प्रज्ञप्ताः, तेषु सर्वेषु त्वं वससि ? विशुदतरको नैगमो भणति-जम्बूद्वीपे बसामि । जम्बूद्वीपे दश क्षेत्राणि प्रज्ञतानि, तद्यथा-भारतम् ऐरवतं हैम्वतम् ऐरण्यवतं हरिवर्षे रम्यकर्ष देवकुरवः उत्तरकुरवः पूर्वविदेहः अपरविदेहः, तेवु सर्वेषु त्वं वससि ? विशुद्धतरको नैगमो भगति भारते वर्षे वप्तामि । भारत घससि) तो क्या तुम इन सबों में रहते हो ? (विसुद्धोणेगमा भणइ) तय विशुद्ध नैगमनय के अभिप्राय के वशवर्ती बनकर उसने कहा-(तिरिए छोए वसामि) मैं तिर्यक्लोक में रहता हूं। (तिरियलाए जंबूद्दीवाइया सयंभूरमणपज्जवसाणा असंखिज्जादीवसमुहापण्णत्ता) तब फिर पूछने बालेने पूछा कितिर्यक्रलोक में जंबूद्वीप आदि स्वयंभूरमण पर्यंत असंख्यात द्वीपसमुद्र कहे गये हैं, तो क्या (तेसु सम्वेसु तुर्व वससि) तुम इन सत्रों में रहते हे ? (विसुद्धतरामो मेगाभण जंबूद्दीवेवसामि) तब विशुद्धतर नैगमनय के अभिप्राय वशवर्ती बनके उसने उत्सर दिया कि मैं जंगीप में रहता हूं। (जंबूढीवे दसखेत्ता पण्णत्ता) तब फिर पूछने खाले ने पूछा कि जंबूछोप में दशक्षेत्र कहे गये हैं । (तं जहा) जैसे (भरहे एरवए हेमवए. एरण्णवए, हरिषस्से, रम्मगवस्से, देवकुरू, उत्तरकुरू पुरुषधिदेहे अवरविदेहे,) भरत, ऐरवत, हैमवत, ऐरण्यवत, हरिवर्ष, रम्पकवर्ष, देवकुरू उत्तरकुरू पूर्वविदेह, अपरविदेह, (तेसुसम्वेसु तुवं वससि) तेो क्या तुम इन दश क्षेत्रों में रहते हो? (विसुद्धतराभोणेगमें भणइ-भरहे वसामि) तथ विशुद्धतर नैगमनय के अभिप्रायानुसार संयभूरमण रज्जवसाणा असंखिज्जा दीवसमुदा पण्णत्ता) त्यारे । પ્રશ્નક્તાએ પ્રશ્ન કર્યો કે તિર્યકુ લેક જંબુદ્વીપ વગેરે સ્વયંભૂરમણ પર્યત अभ्याती५ समुद्र छे. तशु (सु सन्वेसु तुवं वससि) तमे ॥ सभा निवास ४२। छ। ? (विसुद्धतरामो णेगमो भणइ जंबू दीवे वसामि) ત્યારે વિશુદ્ધતર નિગમનયના અભિપ્રાય મુજબ તેણે જવાબ આપે કે હું मुद्वीपमा छु. (जंबुद्दीवे दपखेत्ता पण्णत्ता) त्यारे ५ प्रनामे प्रश्न या भूदी५i A क्षेत्र भावसi छ. (त जहा भरहे एरवए, हेमवए, ऐरण्णवए, हरिवस्से, रम्मगवस्से, देवकुरु, उत्तरकुरु, पुञ्चविदेहे, अवरविदेहे) भरत, मेर१त, भरत, मै२९यवत, विष, २भ्य १, १२, उत्त२१२, विड, अपवि. (तेसु सम्वेसु तुवं वससि) तो शुतमे मा स अत्रामा निवास । छ। १ (विसुद्धतराओ णेगमो भणइ भरहे वसामि) त्यारे વિશુદ્ધતર તૈગમનયના અભિપ્રાયાનુસાર તેણે જવાબ આપે કે ભારત
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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