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________________ अनुयोगद्वारसूत्रे रामि । तं चं कोऽपि विलिखन्तं दृष्ट्वा वदति, कि त्वं विलिखसि ? विशुद्धतरको नैगमो भणति प्रस्थकं विलिखामि । एवं विशुद्धतरस्य नैगमस्थ नामाकुहितः प्रस्थकः । एवमे। व्यवहारस्यापि । संग्रहस्य चितमितमेयसमारूढः प्रस्थकः । ने प्रस्थक के निमित्त काष्ठ के मध्यभाग को निकालते हुए देखा-तो देखकर पूछा यह तुम क्या कर रहे हो-तब उसने विशुद्धतर नैगमनय के अभिप्राय के वशवर्ती बनकर उत्तर दिया मैं प्रस्थक को उकेर रहा हूं। (तं च के विलिहाण पासित्ता वएज्जा, किं तुवं विलिहसिविसुद्धतराम्रो लेगमो भणइ, पत्थयं विलिहामि) जब वह उस उत्कीर्ण काष्ठ पर लेखनी से प्रस्थक बनाने के लिये चिह्नित करने लगा अर्थात् प्रस्थक के आकार की रेखाएं करने लगा तब उसे इस प्रकार देखकर किसीने उससे पूछा तुम यह क्या कर रहे हो-तब उसने विशुद्धतर नैगमनय के अभिप्राय वशवर्ती होकर कहा मैं प्रस्तक के आकार को अंकित कर रहा हूं। (एवं विसुद्धतरस्स णेगमस्सनामाउड़िओ पत्थओ) उक्त रीति से इस प्रस्थक विषय में इस प्रकार से वहां तक प्रश्नोत्तर रूप में कहते चला जाना चाहिये कि जब तक विशुद्धतर नैगमनय का विषयभूत वह संकल्पित नाम प्रस्थक बनकर तैयार न हो जावे । (एव. मेव ववहारस्स वि) इसी प्रकार से व्यवहार नय को आश्रित करके જ્યારે તેને કોઈએ પ્રસ્થક-નિમિત્ત કાષ્ઠના મધ્યભાગને કહાડતાં જે તે તે જઈને પૂછયું–આ તમે શું કરી રહ્યા છે ?' ત્યારે તેણે વિશુદ્ધતર નૈગમનય મુજબ જવાબ આપતાં કહ્યું કે હું પ્રસ્થક ઉકીર્ણ કરી રહ્યો છું. (तच केइ विलिहमाणं पासित्ता वएज्जा, कि तुवं विलिहसि-विसुद्धतराओ णेगमो भणइ परथयं विलिहामि) न्यारे a Grahey आ४ 6५२ वैमनी પ્રક માટે ચિહ્નો કરવા લાગે એટલે કે પ્રથકના આકારની રેખાઓ ઉત્કીર્ણ કરવા લાગ્યા ત્યારે તેને આ પ્રમાણે કરતે જોઈને કોઈએ પૂછયું, “તમે આ શું કરી રહ્યા છે. ત્યારે તેણે વિશુદ્ધતર ને ગમનયના મત મુજબ हुछे हुँ प्रस्नो पारने त श रह्यो छु. (एवं विसुद्धतरस्स णेगमस्स नःमाउडिओ पत्थ भो) 41 प्रस्थान या 6५२ भुराम त्यां સુધી પ્રશ્નોત્તર કરતાં રહેવું જોઈએ કે જ્યાં સુધી વિશુદ્ધતર નગમનયને વિષયભૂત તે સંકલ્પિત નામ પ્રથક સંપૂર્ણ રીતે તૈયાર ન થઈ જાય. (एवमेव वनहारस्ववि) मा प्रमाणे व्यसायनयन. आश्रित शन ARY
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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