SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 499
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ४८६ अनुयोगवारस्ते संस्थानगुणप्रमाणं वृत्तसंस्थानगुणप्रमाणं व्यस्रसंस्थानगुणप्रमाणं चतुस्रसंस्थानगुणममाणम् , आयतसंस्थानगुणप्रमाणम् । तदेतत् संस्थानगुणप्रमाणम् । तदेतत अजीवगुणप्रमाणम् ॥ सू० २१९ ॥ ... टीका-'से कि त' इत्यादि: अथ किं तद् गुणपमाणम् ? इति शिष्यपश्नः । उत्तरयति-गुंणप्रमाणम्प्रमितिः प्रमाणम् , प्रमीयतेऽनेनेति वा प्रमाणम् , प्रमीयते यत्तद्वा प्रमाणम् । प्रमाण है । (से किं तं संठाणगुणप्पमाणे ?) हे भदन्त ! वह संस्थान गुण प्रमाण क्या है ? (संठाणगुणप्पमाणे पंचविहे पण्णत्ते) उत्तर--संठाण गुणप्रमाण पांच प्रकार का कहा गया है । (तंजहा) असे-(परिमंडलसंठाणगुणपमाणे) परिमंडसंस्थानगुणप्रमाण, (वठ्ठसंठाणगुणपमाणे) वृत्तसंस्थानगुणप्रमाण (तंतसंठाणगुणप्पमाणे) यस्र संस्थानगुणप्रमाण (चउर संसठाणगुगप्पमाणे) चतुरस्र संस्थान. गुणप्रमाण (आपथसंठाण गुणप्पमाणे) आयतसंस्थानगुणप्रमाण, (से तं संठाणगुणपमाणे) यह संस्थानगुणप्रमाण हैं । (से तं अजीवगुणप्पमाणे) इस प्रकार पूर्वप्रकान्त अजीव गुणप्रमाण हैं। भावार्थ-यह पहिले स्पष्ट कर दिया है कि 'प्रमाण शब्द की व्युत्पत्ति भाव, करण और कर्म इन तीनों साधनों में होती है। 'प्रमितिः प्रमाणम्' यह प्रमाण शब्द की व्युत्पत्ति भावसाधन में है। "प्रमीयते अनेन" यह शब्द की व्युत्पत्ति करणसाधन पक्षमें है "प्रमीयते यत् तत्प्रमाणम्" यह प्रमाणशब्द का व्युत्पत्ति कर्म साधन. RE! स्थान YY ५मा छ १ (संठाणगुणप्पमाणे पंचविहे पण्णत्ते) उत्तर-स्थान गुणप्रभा पांय ५२नु अपामा मा०यु छे. (त जहा) २ (परिमंडलसंठाणगुणप्पमाणे) परिभण संस्थान गुमाए (वसंठाग गुणप्पमाणे) वृत्तस स्थान सुप्रभात (तससंठाणगुणप्पमाणे) >य सस्थान गुमाए (चउरंससंठाणगुणप्पमाणे) यस संस्थान शुमार (आययसंठाणगुणप्पमाणे) भायत संस्थान गुथुप्रभार (से त संठाणगुणप्पमाणे) मा रीते स्थान YE प्रमाण छ. (से त अजीवगुणप्पमाणे) આ પ્રમાણે પૂર્વ પ્રકાન્ત અજીવ ગુણ પ્રમાણ છે. ભાવાર્થ-આની પહેલાં સ્પષ્ટ કરવામાં આવ્યું છે કે પ્રમાણ શબ્દની युत्पत्ति भाव ४२५ मन ४ मा नये साधनामा डाय छे. 'प्रमितिः प्रमाणम् ' . प्रमाण शनी व्युत्पत्ति सा साधनमा छे. 'प्रमोयते अनेन' मा प्रभार सनी ०युत्पत्ति ४२५४ साधन पक्षमा छ. 'प्रमीयते यत्
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy