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________________ ४७० अनुयोगद्वारसूत्रे तत्र यानि तानि ब द्वानि तानि खलु असंख्येगानि । तानि च संख्येयोत्सपिण्यवसर्पिगोभिरपहियन्तेऽतः कालमाश्रित्यैतानि असंख्येयोत्सर्पिण्यवसर्पिणीसमयराशितुल्यानि । क्षेत्राः प्रतरस्यासंख्येय मागेऽसंख्येयाः श्रेयः-पारस्यासंख्येयभागवर्तिन्यो या असंख्पेयाः श्रेगयस्तद्गता यावन्तः प्रदेशाः सन्ति तावत्पदेशपमा. णानि क्षेत्रतो व्यन्तरबद्धवैक्रियशरीराणि । ननु प्रतरासंख्येयभागेऽसंख्येया योजनकोटयोऽपि भान्ति, तत्किमेतावत्यपि क्षेत्रे या नभःश्रेण यो भवन्ति ता प्रकार के कहे हुए हैं (तं जहा) जैसे (घरेल्लया य मुक्केल्लया य) एक बद्ध और दूसरे मुक्त। (तस्थ णं जे ते बद्धेल्लया ते णं असंखिज्जा) इन में जो बद्ध वैक्रियशरीर हैं वे सामान्य से असंख्यात हैं। (असंखिज्जाहिं उस्तप्पिणीभोसप्पिणीहि अवहीरंति कालओ) काल की अपेक्षा ये असंख्यात उत्सर्पिणी काल के जिनने समय होते हैं उतने हैं। (खेत्तमो असंखिज्जाओ सेढीमो पयरस्स असंखिज्जहभागे, तासि णं सेढी णं विक्कंभसूई संखेज्जजोयणसयवरगपलिभागो पयरस्स) तथा क्षेत्र की अपेक्षा इनका प्रमाण इस प्रकार से है कि प्रतर के असंख्यातवें भाग में रही जो असंख्यात श्रेणियां हैं सो उन श्रेणियों के जितने प्रदेश हैं, उतने प्रदेश प्रमाण ये हैं-अर्थात् व्यन्तरों के ये बद्ध क्रियशरीर प्रतर के असंख्यातवें भाग वर्तमान असंख्यात श्रेणिरूप हैं। शंका-प्रत्तर के असंख्यातवें भाग में वर्तमान असंख्यात योजन कोटियां भी होती हैं। ४२१ामा माय छे (तं जहा) मई (बद्धेल्छया य मुक्के लया य) मे भद्ध अने भी मम (नत्य ण जे ते जे बद्धेल्लया तेणं असंखिज्जा) मामा २ म. वैठियशरी। छ, ते सामान्यनी अपेक्षा असभ्यात छ. ( असं. खिज्जाहिं उस्सपिणीओसप्पिर्ण हिं अवहीर ति कालओ) ५.जनी अपेक्षा । અસંખ્યાત ઉત્સર્પિણ અને અપસર્પિણી કાળના જેટલા સમયે હેય छे, तेटा 2. (खेतो असंखिज्जाओ सेढीओ पयररस असंखिज्जइभागे, तासिणं सेढीण विक्खंभसूई सखेज्जजोयणसयवग्गपलिभागो पयरस्स) तम क्षेत्रनी અપેક્ષા એમનું પ્રમાણ આ પ્રમાણે છે કે પ્રતરના અસંખ્યાતમાં ભાગમાં આવેલી જે અસંખ્યાત એશિઓ છે તે શ્રેણિએના જેટલા પ્રદેશ છે, તેટલા પ્રદેશ પ્રમાણ એઓ છે એટલે કે વ્યંતરોના આ બદ્ધ વૈક્રિયશરીર પ્રતરના અસંખ્યાતમાં ભાગમાં વર્તમાન અસંખ્યાત શ્રેણિરૂપ છે. શંકા–પ્રતાના અસંખ્યાતમા ભાગમાં વર્તમાન અસંખ્યાત જન કેટીઓ પણ હોય છે.
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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