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________________ अनुयोगचन्द्रिका टीका सूत्र २१३ नारकादीनामौदारिकादिशरीरनि०१७ शरीराणि प्रज्ञतानि ? गौतम ! वैक्रियशरीराणि द्विविधानि प्रज्ञप्तानि, तद्यथा• बद्धानि च भुक्तानि च । तत्र खल्लु यानि तानि बद्धानि तानि खलु असंख्ययानि असंख्येयाभ्य उत्सपिण्यवसर्पिणीभ्योऽपहियन्ते ‘कालतः, क्षेत्रतः असंख्येयाः नेरहया णं ओरालियसरीरा तहा भाणियवा) हे. गौतम । असुरकुमारों के औदारिक शरीर नारकों के औदारिकशरीर के जैसा ही होते है-अर्थात्-जिस प्रकार. वैक्रिय शरीरवाले होने के कारण नारकों में पद्धऔदारिक शरीर नहीं होते हैं वैसे ही अस्तुरकुमारों को चैक्रिय शरीरशाली होने के कारण उनके भी बद्धऔदारिक शरीर नहीं होते हैं। परन्तु जो मुक्त औदारिक शरीर हैं वे जिस प्रकार नारकों में सामान्यतः अनन्त होते है:उसी प्रकार यहां पर भी वे अनन्त होते हैं । (असुरकुमारणं भंते ! केवड्या वेउशियसरीरा पण्णत्ता ?) हे भदन्त ! असुकुमारों के वैक्रियशरीर कितने होते हैं ? (गोयमा ! वेवियसरीरा दुधिला पण्णत्ता-तं जहा-बदल्लया य-मुक्केल्लया य-तस्थ ण जे. ते..पद्धल्लया, ते णं अलखिज्जा, असंखिज्जाहिं उत्सप्पिणीओसप्पिणी हिं अवहीरति कालओ) हे गौतम ! वैक्रिय शरीर दो प्रकार के कहे गये हैंएक तो यद्ध क्रियशरीर और दूसरे मुक्त वैक्रियशरीर इनमें जो घद्ध वैक्रिय शरीर हैं, वे अतुरकुमारों में सामान्य रूप से असंख्यात होते हैं। काल की अपेक्षा इनके बद्ध वक्रिय शरीर असंख्यात उत्सर्पिणी (ગૌતમ! અસુરકુમારના દારિક શરીર નારકોના દારિક શરીરની જેમ જ હોય છે. એટલે કે જેમ ક્રિયશરીરવાળા હોવાથી નારકમાં બદ્ધ ઔદારિક શરીરે હોતા નથી, તેમજ અસુરકુમારેને વૈક્રિયશરીરશાલી હોવા બદલ તેમના પણ બદ્ધ ઔદારિક શરીર હોતા નથી. પરંતુ જે મુકત ઔદારિક શરીર છે, તે જેમ નારકોમાં સામાન્યતઃ અનંત હેય છે, તેમજ અહી પણ ते अनत जाय छे. (असुरकुमाराणं भंते ! केवइया वेउव्वियसरीरा पण्णमा) के महत ! असुरसुमारेशना वैष्ठिय शरी। 26i डेय छे ? (गोयमा..। वेउ. व्विय सरीरा दुविहा पण्णत्ता-तंजहा बदल्लया य मुक्कैल्लया य-तत्थ गं जे.ते बद्धेल्लया, ते णं असंखिजा, असंखिज्जाहि उस्सप्पिणी ओंसप्पिणीहिं अषहीरंति कालो) गीत ! यशशश में जाना वाम भाव्या. એક બદ્ધક્રિય બીજુ મુક્તધકિય આમાં જે બકિય શરીરે છે, તેં અસુરકુમારમાં સામાન્ય રૂપથી અસંખ્યાત હોય છે. કાલની અપેક્ષાથી એમના . આ બદ્રક્રિયા શરીરે અસંખ્યાત ઉત્સર્પિણી અને અવસર્પિણી કાળના એક अ० ५३
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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