SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 371
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ટ अनुयोगद्वारसूत्रे डीनाम् । तत्र खलु एकमेकं वालाग्रम् असंख्येयानि खण्डानि क्रियते । तानि खलु बालाग्रखण्डानि दृष्टयवगाहनातः असंख्येयभागमात्राणि, सूक्ष्मस्य पनकजी - वस्य शरीरावगाहनातोऽसंख्येयगुणानि । तानि खलु वालाग्रखण्डानि नो अग्नि दहेत् यावत् नो पूर्वितां हन्यमागच्छेयुः । ये खलु तस्य पल्यस्य आकाशप्रदेशास्तैर्वालाग्र खण्डे स्पृष्टा वा अनास्पृष्टा वा ततः खलु समये समये एकमेकम् आकाप्रदेशम् अपहाय यावता कालेन तत् पल्यं क्षीणं यावद् निष्ठितं भवति, तदेतत् सात दिन तक के ऊगे हुए बालाग्रों से भरो। (तत्थ णं एगमेगे बालग्गे असंखिज्जाई खंडाई कज्जह) इन भरे हुए बालाओं से एक २ बालाग्र के केवली की बुद्धि से असंख्यात २ खंड करो । ( ते णं बालग्गखंडा दिट्ठि ओगाहणाओ असंखेज्जइ भागमेत्ता, समस्त पणगजीवस्स सरीरो ग्गाहणाओ असंखेज्जइगुणा) ये बालाग्र - खंडदृष्टिपथ प्राप्त वस्तु की अपेक्षा असंख्यातवें भाग मात्र और सूक्ष्म पणक जीव की शरीरा वगाहना की अपेक्षा असंख्यात गुणें बड़े होते हैं। (ते गं बालग्गखंडा णो अग्गी डहेज्जा जाव णो पूहत्ताए ह。त्रमागच्छेज्जा) ये बालाग्र खंड उस पल्प में इस रीति से भरना चाहिये कि - 'जिससे उन पर अग्नि हवा आदि का प्रभाव काम न कर सके और न वे सड़ गल ही सकें । (जेणं तस्स पल्लास आगासपएसा तेहिं वालग्गगखंडेहि आफुण्णा बा अणाकुण्णा वा) उन भरे हुए वालाग्रखंड़ों से उस पल्प के आकाश प्रदेश चाहे व्याप्त हों चाहे न भी हों (तओ णं समय समए एगमेगं हिवस सुधीना माझाथी भरवामां आवे (तत्थ णं एगमेगे बालग्गे असंखिज्जाई રણંશારૂં જ્ઞ૬) આ સપૂત બાલાશ્રોમાંથી એક એક ખાલાથને ડૅવલીની બુદ્ધિ बडे असभ्यांत असंख्यात अउ करवामां भावे. (से णं बालग्गखंडा दिट्ठि ओगाहणांओ असंखेज्जइभागमेत्ता, सुहृमस्ट पणगजीवस्स सरीरोग्गाहणाओं असं બાલાગ્ર ખડા દૃષ્ટિપથ પ્રાપ્ત વસ્તુની અપેક્ષા અસखेज्जइ गुणा भा ખ્યાતમા ભાગ માત્ર અને સૂક્ષ્મ પણુક જીવની શરીરાવગાહનાની અપેક્ષા असख्यातगया होय छे. (टेणं बालगगखंडा णो अग्गी डहेम्जा जाव पूइत्ताप इव्वमागच्छेज्जा) मा आसाम । ते चयमां मेवी रीते लवा हो ! જેથી તેમની ઉપર અગ્નિ, પવન વગેરેની અસર થાય નહિ તે કહી શકે नहि ते भोगणी शडे नहि. (जे णं तस्स पल्लस्स आगासपरसा तेहि बाला"खडेहि आफुण्णा वा अणाकुण्णा वां) ते बरेसा वासार्थम' अभांथी ते पस्यना माठाशप्रदेशी असे व्यास हाय हैं न पशु डोय. (तओण' समए समए एगमेग
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy