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________________ २६२ अनुयोगद्वारसूत्रे खच वालाग्राणि अग्निर्नो दहेत् वायु हरेत्, अनीव निचितत्वान्न तत्राग्निवायुं क्रते इत्यर्थः । तथा-नो कुथ्येयुः =ानि वालाप्राणि मचयविशेषादेव शुषिरामाचार वायोरसंभवाच्च नासारतां गच्छेयुः, अतएव च न परिध्वं सेरन् = कतिपयपरिनङ्गीकृत्य नो विध्वंसं प्राप्नुरित्यर्थः, तत् एव च-नो पूतितया कदा चिदप्यागच्छेयुः न कदाचिद् दौर्गन्ध्यं प्राप्नुयुरित्यर्थः । ततः खलु = ताभ्यो वाळाग्र कोटिभ्यः खलु समये समये = पविसमयम् एकमेकम् वालाग्रम् अपहाय= सा भी स्थान खाली न रहने पावे । (तेणं वालग्गा नो अग्गी डहेज्जानो वाऊ हरेज्जा, नो कुहेज्जा, नों पलिविद्धंसिज्जा) तथा जो बालाग्र उसे कुंए में भरे गये हैं, ने अग्निदाह से सुरक्षित रहें, तथा वायु उन्हें उडान सके इस रूप से वे उसमें दाब कर भरे जाना चाहिये ।. जब वे वहां दाब २ कर भरे जावेगे तभी उन पर अग्नि और वायु का प्रभाव नहीं पड़ सकेगा ' यही बात इन पदों से सूचित की गई है। खूप निबिडरूप में भरे जाने के कारण जब वहां शेष खाली जगह हीं नहीं रहेगी-तय वायु के अप्रवेश से वे अक्षारता को भी प्राप्त नहीं कर सकेगे और इसी कारण उनमें कुछ थोडे से भी रूप में परिशाटन - सडनापना नहीं हो सकेगा । जब किश्चित् भी सडनापना नहीं आयेगा तब वे विध्वंसको प्राप्त नहीं होंगे और (णोपूहत्तीए ह०) न उनमें दुर्गन्ध ही आवेगी। इस प्रकार से ही कुंर में उन बालाग्रों को भर देना चाहिये । (तओणं समए समए एगमेगं 'बालगं > यस स्थान रिक्त हेमाय नहि (वेण वालग्गा नो अग्गी डहेज्जा. नो बाऊ हरेज्जा, नो कुहेज्जानो पलि विद्वेसिज्जा) तेभन ने मालाओ ते वामां लश्वामां આવ્યા છે, તે અગ્નિથી મળી શકતા નથી તેમજ પવનથી પણ તે ઉડાવી શકાતા નથી તે પ્રમાણે ઠાંસી-ઠાંસીને ખાલાો કૂવામાં ભરવા જોઈએ જ્યારે બાલગ્રો ઠાંસી-ઠાંસીને ભરવામાં આવશે ત્યારે જ તેમના પર અગ્નિ તથા વાયુના પ્રભાવ પડશે નહિ એજ વાત આ પદો વડે સૂચિત કરવામાં આવી છે એકદમ ઠાંસીને ભરવાથી જ્યારે ત્યાં સહેજ પણ ખાલી જગ્યા રહેશે નહિ ત્યારે પવનના અપ્રવેશથી તેએ અસારતાને પણ પ્રાપ્ત કરશે નહિ અને એથી જ તેમાં થાડા પણ કેવાહા લાગશે નહી. જ્યારે તેઓમા થાડા પણ સડા ઉત્પન્ન થશે નહિ ત્યારે તે સુરક્ષિત રહેશે એટલે કે વિશ્વસ્ત थशे नहि खने (जो पूइत्ताए.......इ.) तेथेोभां दुर्गष पशु उत्पन्न थशे नहि मा प्रमाथे श्वामां ते जासाथ लवा लेहये. (तओण समए समए एगमेगं
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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