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________________ अनुयोगद्वारसूत्र स्ववैपरीत्येन निर्वर्तना तत्सकाशादुत्पन्नः। रूपस्य विपरीतविडम्बना-पुरुषस्य स्त्रीरूपधारणम् , स्त्रिया वा पुरुषरूपधारणम् । वयसो विपरीतविडम्बना तरुणस्य वृद्धजनवद्, वृद्धस्य तरुणजनवचेष्टाकरणम् । वेषस्य विपरीतविडम्बना स्ववर्गीयं स्वदेशीयं वा वेषं परित्यज्य परवर्गीयस्य परदेशीयस्य वा वेपस्य धारणम् , यथा राजपुत्रादे वैणिग्वेषधारणम्, गुर्जरादीनां मालवीयादिवेषधारणम्। भाषाया विपरीवविडम्बना स्वदेशीयो भाषां परित्यज्य परदेशीयभाषया भाषणम्। एतदर्शनश्रवणादिसंजात इत्यर्थः, तथा-मनः प्रहर्षः मनः महर्षजनकः प्रकाशलिङ्ग:-प्रकाश:= भ्रूनेत्रवत्रादीनां विकासो लिङ्ग-चिह्न, प्रकाशानिमस्फुटानि उदरपकम्पनाहहारूप धारण करना यह रूप की विपरीत विडंबना है। तरुण जन द्वारा वृद्ध पुरुष की तरह और वृद्ध पुरुषों द्वारा तरुण व्यक्तियों की तरह चेष्टाएँ करना यह वय की विपरीत विडंबना है। अपने वर्ग के या देश के वेष को छोड़ कर परवर्ग के या परदेश के वेष को अपनाना जैसेराजपुत्र आदिकों का वणिग्वेष धरना, गुजरातियों का मालवीय वेषधारना यह वेष विपरीत विडंबना है । अपने देश की भाषा का परित्याग कर परदेशी भाषा से भाषण करना-घोलना , यह भाषा विपरीत विडंबना है । इनरूपादिकों की विपरीत विडंबना देखने से तथा सुनने से इस हास्य रस की उत्पत्ति होती है। यह (पगोसलिंगों) 5 नेत्र और वक्त्रमुख , आदि का विकाश होना इसका चिह्न है । अथवा पेटका प्रकम्पन होना, अहहास आदि होना ये सब इसके चिह्न हैं । ऐसा વિપરીત વિડંબના છે. તરણ વ્યક્તિ વડે વૃદ્ધ વ્યક્તિની જેમ અને વૃદ્ધ વ્યક્તિ વડે તરણ વ્યક્તિની જેમ ચેષ્ટાઓ કરવી આ વયની વિપરીત વિડં. બના છે પિતાના વર્ગના અથવા પોતાના દેશના વેષને ત્યજીને પરવર્ગના અથવા પરદેશના વેષને ધારણ કરવું, જેમ કે રાજપુત્ર વગેરેએ વણિક ધારણ કર, ગુજરાતીઓને માલવીયવેષ ધારણ કરે આ વેષ વિપરીત વિડંબના છે. પિતાના દેશની ભાષાને છેડીને પરદેશી ભાષામાં બોલવું આ ભાષા વિપરીત વિડંબના છે. આ રૂપ વગેરેની વિપરીત વિડંબના જેવાથી तभर साथी म हास्यरसनी पत्ति थाय छे. भ. (मणप्पहासो) भानः घड ट -भनन त ४२ना२ छे. (पगास लिंगो) अनत्र भने વત્ર-સુખ વગેરેનું વિકસિત થવું આનું ચિહ્ન છે. અથવા તે પેટ જવું, भट्टलास वगैरे २५ मा मधासना शिही छे. सवा 2 "हासो रस्रो होइ"
SR No.040004
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1968
Total Pages925
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size147 MB
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