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________________ ७५२ अनुयोगद्वार (अस्थिणामे उवसमियनइयपारिणामियनिष्फण्णे) आठवां-औपशमिक क्षायिक और पारिणामिक इन तीन भावों के संयोग से निष्पन्न औपशमिक क्षायिक पारिणामिक नाम का सान्निपातिक भाव (अस्थिगामे उवसमियखोवसमियपारिणामियनिफण्णे) नौवां-औपशमिक, क्षायोपशमिक और पारिणामिक इन तीन भावों के संयोग से निष्पन्न औपशमिक क्षायोपशमिक पारिणामिक नाम कासान्निपातिक भाव, अत्थिणामे खहयखोवसमियपारिणामियनिष्फण्णे) दसवांक्षायिक, क्षायोपशमिक, और पारिणामिक इन तीनों भावों के संयोग से निष्पन्न क्षायिक क्षायोपशमिक पारिणामिक नामका सान्निपातिक भाव । (कयरे से णामे उदइयउवसमियखइनिष्फण्णे) प्रश्न-हे भदन्त ! औदयिकौपशमिक क्षायिक नाम का जो प्रथम त्रिक भाव संयोगी सान्निपातिक भाव है वह कैसा है ? उत्तर-(उदइय उवसमियखझ्यनिष्फण्णे) औदयिकोपमिक क्षायिकनाम का जो प्रथम त्रिक संयोगी सान्निपातिक भाव है वह ऐसा है. उदाएत्तिमणुस्से उवसंता-कप्ताया खहयं संमत्तं) मनुष्यगति औदयिक भाव में है कषायों का उपशम औपशमिक भाव में हैं और क्षायिक __ (अत्थि णामे उवसमियखइयारिणामियनिष्फण्णे) (८) भोपशभिड, ક્ષાયિક અને પરિણામિક, આ ત્રણ ભાવોના સંગથી બનતે “ઓપશમિક ક્ષાયિક પારિણામિક નામનો સાન્નિપાતિક ભાવ.” (अत्थिणामे उवसमिय खओवसमिय पारिणामिय निटकण्णे) (4) भोपामि, ક્ષાપશમિક અને પરિણામિક, આ ત્રણ ભાવેના સંયોગથી બનતે “પશમિક શાયોપશમિક પરિણામિક નામને સાન્નિપાતિક ભાવ.” (अत्थिणामे खइयखओवसमियपारिणामियनिफण्णे) (१०) यि, क्षाया५श. મિક અને પરિણામિક, આ ત્રણ ભાવોના સંયોગથી બનતે “ક્ષાયિક ક્ષાયોપશમિક પરિણામિક નામને સાન્નિપાતિક ભાવ.” प्रश्न-(कयरे से णामे उदइयउवसमियखइयनिष्फण्णे ?) ३ सन् ! ઔદયિકૌપથમિક ક્ષાયિક નામને જે પહેલે ત્રિકભાવ સગી સાન્નિપાતિક ભાવ છે તે કેવો છે? उत्तर-(उदइयउवसमियखइयनिष्फण्णे) मौयि: भोपशभिः क्षायि: નામને જે પહેલો વિકભાવસંગી સાન્નિપાતિક ભાવ છે તે આ પ્રકારને -(उदइए त्ति मणुस्से उवसंता कसाया खइयं संमत्त) मनुष्य गति मोहयि ભાવ છે, કષાયને ઉપશમ ઔપથમિક ભાવ છે અને ક્ષાયિક સમ્યકત્વ
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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