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________________ ६९४ अनुयोगद्वारसूत्रे शिष्यः पृच्छति-अथ कोऽसौ औपशमिकः ? इति । उत्तरयति-औषशमिकःउपशमोपशमनिष्पन्नभेदेन द्विविधः प्रज्ञप्तः। तत्र-मोहनीयस्य कर्मण उपशम एव उपशम इत्युच्यते । 'ण' इति वाक्यालङ्कारे । अयं प्रथमो भेदोऽष्टाविंशतिविधस्य मोहनीयस्यैव कर्मग उपशमश्रेण्यां द्रष्टव्यः, 'मोहस्सेवोवसमो' (मोहस्पैवोपशमः) इति वचनात् । अथ द्वितीय भेदमाह-अय कोऽसौ उपशमनिष्पन्नः ? इति प्रश्नः। उत्तरयति-उपशमनिष्पन्न उपशान्तकोषाधुपशान्तकषायछमस्थवीतरागान्तो हे भदन्त ! (से किं तं उवसमिए ?) वह औपशमिकभाव क्या है ? (उवसमिए दुविहे पण्णत्ते). उत्तर-औपशमिक भाव दो प्रकार का कहा गया है। (तंजहा) उसके वे दो प्रकार ये हैं-(उवसमे य उवसमनिष्कण्णे य) एक उपशम और दूसरा उपशम निष्पन्न है । (से किं तं उवसमे?) हे भदन्त ! वह उपशम क्या है ? उत्तर-(उवसमे मोहणिज्जस्स कम्मस्स उवसमेणं) अट्ठाईस प्रकार के समस्त मोहनीय कर्मका जो उपशम है वही उपशम है। यह उपशन ८ वे ९वें १० वें ११ वें गुणस्थान रूप उपशमश्रेणी में होता है। (से तं उवसमे) इस प्रकार यह उपशम है। (से किं तं उवसमनिप्फण्णे ?) हे भदन्त ! वह उपशम निष्पन्न क्या है ? उत्तर-( उपसमनिष्कणे अणेगविहे पण्णत्ते) उवशम निष्पन्न साथ-(से किं तं उपसमिए ?) 3 मापन् ! ते भोपाभानु સ્વરૂપ કેવું કહ્યું? उत्तर-(उवसमिए दुविहे पण्णत्ते) मो५मि भाव में प्रश्न हो छ (तंजहा) त प्ररे। मा प्रभारी छ-(उजसमे य उवसमनिप्फण्णे य) (१) ५शम भने (२) ५शमनि०पन्न. प्रश्न-से कित उवसमे ?) भगवन्! ते ५शभर्नु २१३५ हेतु छ ? उत्तर-उनसमे मोहणिज्जस्स कम्मस्स उनसमेणं) २८ ५४१२ना समस्त મેહનીય કર્મના ઉપશમને જ અહીં ઉપશમ ભાવ કહેવામાં આવ્યું છે. આઠ, નવ, દસ અને અગિયારમાં ગુણસ્થાન રૂપ ઉપશમ શ્રેણીમાં આ ઉપशम भावना समा१२ छे (सेत उवसमे) मा ४२नु' ७५शभनु ११३५ डाय छे. प्रश्न-(से कि त उपसमनिष्फण्णे ?) ३ मा ! श्रीपशम लाना બીજા ભેદ રૂપ ઉપશમ નિષ્પન્નનું સ્વરૂપ કેવું છે? उत्तर-(उवसमनिष्फण्णे अणेगविहे पण्णत्ते) ७५शम निस्पन्न भौ५५भि
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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