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________________ १०८ अत्रोक्ताः संख्या उपलक्षणमात्रम्, अब इतोऽन्या अपि संभापमानाः संख्या आगन्तव्याः। उत्कीर्तनानुपूर्वा नाममात्रोत्कीर्तनं कृतम्, अत्र गणनानुपूष्यों - एकादि संख्यानामभिधानं कृतमिति बोध्यम् । प्रकृतमुपसंहरन्नाह-' से तं' इत्यादि । सैषा गणनानुपूर्वी । मू० १३९॥ अथ प्रागुद्दिष्टामेव संस्थानानुपूर्वीमाहमूलम्-ते किं तं संठाणाणुपुवी ? संठागाणुपुवी तिविहा पण्णता, तं जहा-पुव्वाणुपुवी पच्छाणुपुवी अणाणुपुटवी । से कि तं पुवाणुपुटवी ? पुव्वाणुपुवी-समचउरंसे निग्गोहमंडले सादी खुजे वामणे हुडे । से तं पुवाणुपुवी । से किं तं पच्छाणुपुवी ? पच्छाणुपुवी-डंडे जाव चउरंसे । से तं पच्छाणुपुवी। से किं तं अणाणुपुवी ? अगाणुपुबी एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए छ गच्छगयाए सेढीए अन्नमन्नभासो दुरुवूगो। सेत अणाणुपुटवी। सा एसा संठाणाणुपुठवी ॥सू० १४०॥ छाया-प्रथ का सा संस्थानानुपूर्वी ? संस्थानानुपूर्वी त्रिविधा प्राप्ता, तद्यथापूर्वानुपूर्वी पश्चानुपूर्वी अनानुपूर्वी। अय का सा पूर्वानुपूर्वी ? पूर्वानुपूर्वी-समचतुरस्रं न्यग्रोधमण्डलं सादि कुब्जं शमनं हुण्डम् । सैषा पूर्वानुपूर्वी । अथ का सा पश्चानुपूर्वी ? पश्चानुपूर्वी-हुण्डं यावत् समचतुरस्रम् । सैषा पश्चानुपूर्वी । अथ का दश कोटिशतक की एक एक की वृद्धिवाली श्रेणी में स्थापित संख्या का परस्पर में गुणा करने पर और उत्पन्न उस महाराशि में से भंग द्वय की विवक्षा को कम करने पर अवशिष्टभंगात्मक (से तं अणाणपुबी) अनानुपूर्वी है (से तं गणणाणुपुव्वी) इस प्रकार यह गणनानुपूर्वी का स्वरूप है ॥सू० १३९॥ એકથી લઈને દસ અબ જ પર્યન્તની એક એકની વૃદ્ધિવાળી શ્રેણીમાં સ્થાપિત સંખ્યાનો પરસ્પરની સાથે ગુણાકાર (સંયોજન) કરીને જે ભંગની મહારાશિ ઉત્પન્ન થાય છે તેમાંથી આદિ અને અન્તના બે ભંગને બાદ કરવાથી જે ભગ बाकी २७ छ, मागान (से त अणाणुपुषी) अनानुभूती ३५i भाव है(सेस' गणणाणुपुब्बी) मा प्रा२नु मनानुनि १५३५HARI
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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