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________________ अनुयोगद्वार पनिधि की कालानुपूर्वी पञ्चविधा प्रज्ञप्ता. तपथा-अर्थपदप्ररूपणता, मासमुत्कीनता, मनोपदशनता, समवतारः अनुगमः ॥सू०१५॥ टीका-से कितं' इत्यादि । व्याख्याऽस्य पूर्ववद योध्या । म्० १३५॥ अर्थपदमरूपणतादीनां निरूपणायाह मूलम्-से किं तं संगहस्स अस्थपयरवणया ? एयाई पंच वि दाराइं जहा खेत्ताणुपुबीए संगहस्स तहा कालाणुपुबीए वि भाणियवाणि, णवरं ठिई अभिलायो, जाव से तं अणुगमे से तं संगहस्स अणोवणिहिया कालाणुपुबी ॥सू०१३६॥ छाया-अथ का सा संग्रहस्य अर्थपदपरूपणता ? एतानि पश्चापि द्वाराणि यथा क्षेत्रानुपूयां संग्रहस्य तथा काळानुपूामपि भणि व्यानि, नवरं स्थित्यमिः लापर, यावत् स एपोऽनुगमः। सपा संग्रहस्य अनोपनिधिकी कालानुपूर्वी।मू.१३६॥ टीका-“से कि तं" इत्यादि । अथ का सा संग्रहसम्मताऽर्थपदपरूपणता ? इति प्रश्नः। उत्तरपति-एतानिअर्थपरूपणतादीनि पश्चापि द्वाराणि संग्रहमते क्षेत्रानुपूक्मेकोत्तरशततमे सूत्रे कही गई है (तं जहा) जैले- अषयपरूवणया भंगसमुकित्तणया, भंगाघदसणया 'समोयारे' अणुगमे) अर्थपदप्ररूपणता, भंगसमुत्कीर्तनता, भंगोपदर्शनता समयतार और अनुगम इस सूत्र की व्याख्या पहिले की गई व्याख्या के अनुसार ही जाननी चाहिये।मू०१३५॥ "से किं तं संगहस्स" इत्यादि । शब्दार्थ-- (से किं तं संगहस्स अट्ठपयपरूवणया ) हे भदंत ! सेमहनयमान्य अर्थपद प्ररूपणता क्या है ? (एयाइं पंच वि दाराइं जहा खेत्ताणुपुठवीए संगहस्स तहो कालाणुकुठवीए वि भाणियवाणि) समत भनीपनि खानुषी पाय ॥२नी ही छ. "तं जहा" त पांय अशनीय प्रभारछे-(अटुपयपरूवणया भंगसमुक्त्तिणया, भंगोवदंषणया, समोयारे, अणुगमे) (१) अ५४ प्र३५यता, (२) समुहीत नता, (3) Allપદર્શનતા, (૪) સમવતાર અને (૫) અનુગમ આ સૂત્રની વ્યાખ્યા પહેલાં કહ્યા પ્રમાણે સમજવી ૧૩૫ "से किं तं संगहस्स" त्याह Awan-से किं तं संगहस्स अटुपयपवणया?) भगवन्! स. હનયસંમત અર્થપદ પ્રરૂપણુતાનું સ્વરૂપ કેવું છે? उत्तर-(एयाइं पंच वि दाराइं जहा खेत्ताणुपुवीए संगहस्त तहा कालाणुपु. बीए वि भाणियबाणि) सनयमन त्रानुषी मा म पांये नाश
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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