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________________ अनुयोगद्वारसूत्रे य पवत्तइ ? अंगपविठुस्स वि उद्देसो जाव पवत्तइ, अणंगपविटुस्स वि उद्देसो जाव पत्तवइ । इमं पुण पटवणं पडुच्च अणंगपविटुस्स अणुओगो ॥ ३॥ छाया-यदि श्रुतज्ञानस्य उद्देशः, समुद्देशः, अनुज्ञा. अनुयोगश्च प्रवर्तते किम् अङ्गप्रविष्टस्य उद्देशः, समुद्देशः अनुज्ञा अनुयोगश्च प्रवर्तते १ किम् अङ्गबाह्यस्य उद्देशः समुद्देशः अनुज्ञा, अनुयोगश्च प्रवर्तते ? अङ्गप्रविष्टस्यापि उद्देशो यावत् प्रवर्तते, अनङ्गप्रविष्टस्यापि उद्देशो यावत् प्रवर्तते । इदं पुनः प्रस्थापनं प्रतीत्य अनङ्गप्रविष्टस्य अनुयोगः ॥सू० ३॥ _ टीका-'जइ सुयनाणस्स' इत्यादि यदि श्रतज्ञानस्य उशः समुद्देशः अनुज्ञा अनुयोगश्च प्रवर्तते तर्हि स उद्देशादिः किम् अङ्गप्रविष्टस्य-द्वादशाङ्गान्तर्गतस्याचाराङ्गादेः प्रवर्त्तते, किं वा अनङ्गप्रविष्टस्य-अङ्गबाह्यस्य दशवकालिकादेः प्रवर्तते ? इति शिष्यप्रश्नः। गुरुरुत्तरयति-'अंगप्पविदुरस वि' इत्यादिना। हे शिष्य ! अङ्गप्रविष्टस्यापि उद्देशो "जइ सुयनाणस्स" इत्यादि शब्दार्थ-(जइ) यदि (सुयनाणस्स) श्रुतज्ञान में (उद्देसो) उद्देश (समुद्देसो) समुद्देश, (अणुष्णा) अनुज्ञा (य) और (अणुओगो) अनुयोग इन की (पत्तइ) प्रवृत्ति होती है तो (कि) क्या (अंगपविट्ठग्स) जो अंगप्रविष्ट श्रृंत है उसमें (उदेसा) इन उदेश, (समुद्देसो) समुहेश, (अणुष्णा) अनुज्ञा (य) और (अणुओगो) अनुयोग की (पवत्तइ) प्रवृत्ति होती है ? क्या अथवा जो (अंगबाहिरग्स) अंग बाह्य श्रुतज्ञान है उसमें (उद्देसो समुद्देसो अणुण्णा अणुओगो य पवत्तइ) उद्देश, समुद्देश, अनुज्ञा और अनुयोग इनकी प्रवृत्ति होती है क्या ? उनर-(अंगपविट्ठरस) अंग प्रविष्ट जो आचाराङ्गादि श्रुत है उनमें (वि) भी (उद्देसो य जाव "जइ सुयनाणस्स" त्यile शहाथ- (जइ) ले (सुयनाणग्स) श्रतज्ञानभा (उद्देसो) देश, (समुद्देसो) सभुश, (अणुण्णा) अनुज्ञा (य) भने (अणुओगो पवतई) मनुयोगनी प्रवृत्ति (समाय) थाय छ, त(किं अंगप विस्त) शु२ मगप्रविष्ट श्रुत छ तमा (उद्देसो, समुद्देसो, अणुण्णा य अणुओगो पवत्तइ) से श, समुश, मनुज्ञा भने अनुयोगनी प्रवृत्ति थाय छ ? रे (अंगबाहिरस्स) A140 श्रुतज्ञान छ तभा (उद्देसो, समुद्देसो अणुण्णा अनुओगा य पवत्तइ) देश, सभुश, अनुशा અને અનુયાગની પ્રવૃતિ થાય છે? त२-(अंगपविदास वि उसो जाव पवत्तइ) माया मारे भग
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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