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________________ सोचन्द्रिका टीका सूत्र १०१ क्षेत्रानुपूर्वीनिरूपणम् तब नेषमन्यवहारसम्मवां क्षेत्रानुपूर्वी निरूपयितुमार मूलम्-से किं तं गमववहाराणं अणोवणिहिया खेत्ताणुपुती ? गमववहाराणं अणोवणिहिया खेत्ताणुपुरी पंचविहा पाणचा, तंजहा-अत्यपय रूवणया१,भंगसमुक्त्तिणयार, भंगोवेदसणया३, समोयारे४, अणुगमे ॥सू० १०१॥ गया-अथ का सा नैगमव्यवहारयोः अनौपनिधिकी क्षेत्रानुपूर्वी १ नेगममवहारयोः अनौपनिधिकी क्षेत्रानुपूर्वी पञ्चविधा प्रज्ञप्ता, तघा-अर्थपदररूपपवार, भंगसमुन्कीर्तनता२, भंगोपदर्शनता३, समवतारः४, अनुगम:५।।स्.१०१।। टीका-'से कि तं' इत्यादि अब का सा नैगमव्याहारसम्मना अनी पनिधिकी क्षेत्रानुपूर्वी ? इति शिष्य प्रभा। उत्तरमाह-'नेगमववहाराणं प्रणोवगिहिया' इत्यादि। नैगमव्यवहारयोः नैगमव्यवहारनयसंमत अनौपनिधिकी क्षेत्रानुपूर्वी और दूसरी संग्रानयसंमत अनोपनिधिकी क्षेत्रानुपूर्वी । इस सूत्र की व्याख्या पहिले की तरह जाननी चाहिये । सू० १०० ॥ अब गमव्यवहारनयसंमत क्षेत्रानुपूर्वी का कथन सूत्रकार करते"से कि तं गमववहाराणं" इत्यादि । शब्दार्थ-हे भदन्त ! नैगम और व्यवहारनय संमत अनौपनिधि की क्षेत्रानुपूर्वी का क्या स्वरूप है ? उत्तर-(अणोवणिहिया खेत्ताणुपुथ्वी ) अनौपनिधिकी क्षेत्रानु पूर्वोका स्वरूप इस प्रकार से है-(पंचविहा पण्णत्ता) यह नेगमव्यव. हारनयसंमत अनौपनिधिकी क्षेत्रानुपूर्वी पांच प्रकार की कही गई। (तं जहा) वे प्रकार ये हैं-(अस्थपयपरूवणया १ भंगसमुक्कित्तणया નવી (૨) સંગ્રહનયસંમત અપરિવિકી ક્ષેત્રાનુપૂર્વી આ સૂત્રની વ્યાખ્યા આગળ કહ્યા પ્રમાણે સમજવી. સૂ૦૧૦૦ હવે સૂત્રકાર નિગમવ્યવહાર સંમત ક્ષેત્રાનુપૂર્વીનું નિરૂપણ કરે છે“से किं तणेगमववहाराण" त्याह શખાઈ-પ્રશ્ન-હે ભગવન્! ગમ અને વ્યવહાર નયસંમત અનોપનિ. પિકી ક્ષેત્રાનુપૂર્વનું સ્વરૂપ કેવું છે? 61२-(अणोवणिहिया खेचाणुपुव्वी) अनोपनियती क्षेत्रानुनी १३५ २नु छ-(पंचविहा पण्णत्ता) 0 नाम भने व्यहारनयमत MANS कानुषी पाय न ही छे. (तंजहा) नये प्रभा -बत्वपयपरूपणया, भंगसमुक्तिणवा, भंगोवर्दवणया, समोयारे, बगु.
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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