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________________ नन्द्रिका टीका सूत्र ९८ पूर्व्यानुपूर्व्यादि मेदत्रयनिरूपणम् કરેછે कायः, धर्मास्तिकायः, इति व्युत्क्रमेण निर्दिष्टा । तदेतदुपसंहरन्नाह' से ' इत्यादि, सेवा पञ्चानुपूर्वीति । अथानानुपूर्वी निरूपयति-' से किं तं ' इत्यादिना । मय का सा अनानुपूर्वी ? - न विद्यते आनुपूर्वी पूर्वानुपूर्वी पश्चानुपूर्वीद्वयरूपा मांसा तथा विवक्षितपदानामनन्तरोक्तक्रमद्वयमुमुलध्य परस्परसादृशेः संभवद्भिर्मङ्गकैर्यस्यां विरचना क्रियते सानानुपूर्वीत्यर्थः । सा हि - एतस्याम् = अनन्तराषिकतधर्मास्तिकायादिसम्बन्धिन्याम्, एकादिकायाम् = एक आदिर्यस्यां सा तथा तस्याम्, पुनः- एकोत्तरिकायाम् एकैक उत्तरः प्रवर्धमानो यस्यां सा तथा पोग्गलस्थिकाए, जीवस्थिकाए आगासत्थिकाए, अहमस्थिका धम्मस्थिकाए) अद्धा समय, पुद्गलास्तिकाय, जीवास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, अघमस्तिकाय, धर्मास्तिकाय । इस प्रकार जो धर्मादिक द्रव्यों का व्युत्क्रम से निर्देश है (सेतं पच्छाणुपुत्री) वह पश्चानुपूर्वी है। (से किं अणाणुपुब्बी) हे भदन्त ! अनानुपूर्वी का क्या स्वरूप है ? (अणाणुपुत्रो ) उतर - अनानुपूर्वी का स्वरूप इस प्रकार है- ( एयाए चेव एगाइयाए एगुत्तरियाए छ गच्छ्गयाए सेढीए अण्णमण्णभासो दूरुवृणो) जिस में पूर्वानुपूर्वी और पचानुपूर्वी ये दोनों नहीं हैं उसका नाम अनानुपूर्वी है। इसमें विवक्षित धर्मादिक पदों के अनन्तरोक्त क्रमद्वय को उल्लधन करके परस्पर संम्भवित भंगों से उन पदों की विरचना की जाती है इस अनानुपूर्वी मे जो श्रेणी स्थापित की जाती है उसमें सबसे पहिले एक संख्या रखी जाती हैं। बाद में एक एक की उत्तरोत्तर वृद्धि पागलत्यिकार, जीवत्थिकाए, आगासत्थिकाए, अहम्मत्थिकाए, धम्मत्थिकाप) श्रद्धासभय (अज), थुङ्गसास्तिमाय, वास्तिप्राय, आअशास्तिहाय, अधभीસ્તિકાય અને ધર્માસ્તિકાય, આ પ્રકારે ધર્માસ્તિકાય આદિ દ્રવ્યેાને જે स्टाडेमपूर्व'! निर्देश थाय छे, (सेत पच्छाणुपुब्बी) तेनुं नाम पश्चानुपूर्वी छे ? प्रश्न - (से कि अणाणुपुव्वी) डे लगवन् ! अनानुपूर्वी नुं स्व३५ वु' है ? Gत्तर-(अणांणुपुव्वी) मनानुपूर्वी नु ख३५ या प्रभार - (एयाए वेब एग। इयाए एगुत्तरियाए छगच्छ्गयाए सेढीए अण्णमण्णभासो दूरुवूणो) प्रेमां પૂર્વાનુપૂર્વી અને પદ્માનુપૂર્વી એ બન્ને નથી, તેનુ' નામ અનાનુપૂર્વી છે. તેમાં ધર્માસ્તિકાય આદિ પદાના ઉપયુ કત અને ક્રમનુ ઉલ્લંઘન કરીને પસ્પર સભવિત ભંગા વડે તે પદોની વિરચના કરાય છે. આ અનાનુપૂ નીમાં જે શ્રેણી સ્થાપિત કરવામાં આવે છે તેમાં સૌથી પહેલાં એક સખ્યા શખવામાં આવે છે, ત્યાર બાદ છ સખ્યા સુધી ઉત્તરાત્તર એકની વૃદ્ધિ
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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