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________________ अनुयोगपन्द्रिका टीका सूत्र ७० नोआगमतो भावोपक्रममनिरूपणम् २७३ उपायः, स चेह-भगवदनुशासनज्ञानसाधनरूपो ग्राह्यः । उक्तं च-- "सोचा भगवाणुमासणं, सच्चे तत्थ करेज्जुवक्कम ॥” । छाया-श्रुत्वा भगवदनुशासनं सत्यं तत्र कुर्यादुपक्रमम्-इति व्याख्या-सत्यं यथार्थ भगवता तीर्थ करेण प्रोक्तमनुशासनं श्रुत्वा तत्र अनुशासने उपक्रम तत्प्राप्युपायं कुर्यात्-इत्यर्थः। . इत्थं च भगवटुक्तानुशासनप्राप्त्युपोयज्ञस्तत्रोपकमे उपयुक्तश्च आगमतो मावोपक्रम इति । नोआगमतो भावोपक्रमोऽपि द्विविधः प्रज्ञप्तः । तद् यथा प्रशस्तश्च, अप्रशस्तश्च । इह भावशब्दः-अभिप्रायाख्यो जीवद्रव्यपर्यायोऽभिमतः। उक्त च-भावाभिख्याः पञ्च स्वभावसत्ताऽऽत्मयोन्यभिमाया इति । ततश्च-भावस्य इसका भाव यह है कि उपक्रम और उपाय ये एकार्थक शब्द हैभगवान् तीर्थ कर द्वारा कथित अनुशासन के ज्ञान का साधनरूप वह उपक्रम यहां ग्राह्य हुआ है। अन्यत्र ऐसा ही कहा है-(साच्चा) इत्यादि । कि भगवान् के द्वारा कथित अनुशासन बिलकुल सत्य है-उसे श्रवणकर श्रोता का कर्तव्य है कि वह उसकी प्राप्ति का उपाय करें। इस प्रकार भगवदुक्त अनुशासन की प्राप्ति का उपाय जानने वाला ज्ञाता उस उपक्रम में उपयुक्त होता हुआ आगम से भावोपक्रम है। (नोत्रागमओ भावविक्कमे दुविहे पण्णत्ते-त जहा) नो आगमको आश्रित करके भावोपक्रम दो प्रकारका कहा गया है। जैसे (पसत्थे य अपसत्थे य) एक प्रशस्त और दूसरा अप्रशस्त । यहां पर भाव शब्द का अर्थ अभिप्राय है और यह जीव द्रव्य का पर्यायरूप से माना गया है। कहा भी है (भावाभिख्याः ) भावके पांच नाम हैं स्वभाव १, सत्ता २, आत्मा३, योनि ४, और अभिप्राय ५ । इस तरह साधन३५ ते ७५म सही ग्राह्य थयो छ. अन्यत्र १५ मे ॥ छ । 'सोचा" ઈત્યાદિતીર્થકર ભગવાન દ્વારા કથિત અનુશાસન સર્વથા સત્ય છે. તેને શ્રવણ કરનાર શ્રાવકનું તેની પ્રાપ્તિનો ઉપાય કરવાનું કર્તવ્ય થઈ પડે છે. આ પ્રકારે ભગ વદુકત અનુશાસનની પ્રાપ્તિને ઉપાય જાણનાર જ્ઞાતા તે ઉપક્રમમાં ઉપયુકત ઉપયોગ પરિણામથી યુક્ત) હોવાને કારણે આગમની અપેક્ષાએ ભાપક્રમરૂપ હોય છે. _ (नोआगमओ भावविक्कमे दविहे पण्णते) नासागम ला५म में प्रश्न यो छे. (तं जहा) तमे प्रा। नीय प्रभाले छ- (पसत्थे य अपसत्थे य) (१) પ્રશસ્ત અને (૨) અપ્રશસ્ત અહીં ભાવ શબ્દને અર્થ અભિપ્રાય છે, અને તે જીવप्र०यनी पर्याय३५ भानपामा मा०ये। छ. युं ५५ छ "भावाभिख्याः " भावना पांय नाम न2 प्रमाणे छ-(१) २१मा, (२) सत्ता, (3) मात्मा, (४) यानि
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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