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________________ २४६ अनुयोगद्वार मुत्रे === चत्तारि अणुओगदारा भवंति तं जहा उवक्कमे १, निक्खेवे २, अणुगमे ३, नए ४ ॥६०॥ छाया - आवश्यकस्य एप पिण्डार्थो वर्णितः समासेन । अत एकैकं पुनरःपयनं कीर्त्तयिष्यामि ॥ १ ॥ तद्यथा - सामायिक चतुर्विंशतिस्तवो बन्दनकं प्रतिक्रमणं कायोत्सर्गः प्रत्याख्यानम् । तत्र प्रथममध्ययनं सामायिकम् । तस्य खलु इमानि चत्वारि अनुयागद्वाराणि भवन्ति तद्यथा - उपक्रमो निक्षेपः अनुगमो नयः ॥ ६० ॥ तात्पर्य कहने का यह है - इस शास्त्र वा आवश्यकश्रुतस्कंध ऐसा नाम सार्थक है | अतः सार्थक नाम होने से अवश्य करणीय सावद्ययोगविरति आदि का प्रतिपादन सूत्रकार आगे करेंगे । ( एत्तो) इसलिये आवश्यक का संक्षेप से समुदाय अर्थ वर्णन करने के बाद ( पुणे ) पुनः (एकेक अज्झणं) एक एक अध्ययन का (कित्तसामि ) कथन में करूंगा। (त जहा ) वे अध्ययन इस प्रकार से हैं - ( सामाइयं चउवीसत्थओव दणयं पडिक्कम, काउर सग्गो पच्चक्खाणं) १ सामायिक, २ चतुर्विंशतिस्तव, ३ वन्दनक, ४ प्रतिक्रमण ५ कायोत्सर्ग ६, प्रत्याख्यान । (तत्थ पढमं असणं सानाइये) इन ६ अध्ययनो में से १ पहिला अध्ययन सामायिक है। समः आपः - समायः समायः प्रयोजनमस्येति सामायिकम् इस व्युत्पत्ति के अनुसार रागद्वेष से रहित ऐसा आत्मा का ', शब्दार्थ - ( आवस्स यस्स) आवश्य आ नाभे असद्धि सेवा शास्त्रम (एसो) 241 yaisa uzaι (fazëî) lu'sıèî (¤¤¡ài) alguнi (qfò3⁄47) staнi આન્યા છે. આ કથનનું તાત્પર્ય આ પ્રમાણે છે-આ શાસ્ત્રનું આવશ્યક શ્રત સ્કન્ધ' એવું નામ સાÖક છે. આ રીતે આ શાસ્ત્રનું નામ સા ક હેાવાથી, અવશ્ય કરણીય સાવદ્યયેાગ વિરતિ આદિનું પ્રતિપાદન સૂત્રકાર આગળ કરવાના છે. (ો) तेथी भावश्यम्ना समुदाय अर्थनु संक्षिप्तमां वर्षान उरीने (पुण) हवे (एकेकं अज्झयणं) थोड थोड अध्ययननुं (कित्तः स्सामि) वन डु उरीश, मेवु सुत्रर वयन आये छे. (तंजहा) आवश्यना ते अध्ययनानां नाम या प्रमाणे छे ( सामाइयं, चउवीत्थओ वन्दणय पडिक कमणं, काउस्सग्गो पच्चक्त्राणं) (१) सामायि, (२) अतु विशतिस्तव (२४ तीर्थ उरानी स्तुति) (3) बन्हन, (४) प्रतिभालु, (५) अयोत्सर्ग मने (१) प्रत्याख्यान. (तत्थ पढमं अज्झयणं सामाइन ) आछ अध्ययनोभां पडेसु સામાયિક નામનું અધ્યયન છે, જેના દ્વારા મેધ આદિકાના અધિક અધિક પ્રાપ્તિ थती रहे तेनु' नाम अध्ययन छे, "समः आयः = समायः समायः प्रयोजनमस्येति
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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