SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 242
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ अनुयोग बन्द्रिकाटीका. ५३ अकृत्स्नं कन्धनिरूपणम् २२ छाया - अब कोsat अकृत्स्नस्कन्धः १ अकृत्स्न स्कन्धः स एव द्विप्रदेशि - कादिस्वन्धो यावत् अनन्तप्रदेशिक : स्कःधः । स एष अकृत्स्नस्कन्धः || ५३ ॥ टीम- शिष्यः पृच्छति - 'से किं तं' इत्यादि अथ कोऽसावकृत्स्नस्त्रन्त्रः १ इति शिष्यप्रश्नः । उत्तरमाह - अकृत्स्नस्वन्धः - न कृत्स्नः-अकृत्स्नः, स चासौ स्कन्धवेति, अकृत्स्नस्कन्धः - य मादन्योऽपि बृहत्तरः स्कन्धाऽस्ति सोऽपरिपूर्णत्वादकृत्स्नस्वन्ध इत्यर्थः, स तु स एव पूर्वोक्त प्रदेशिकादि सन्धा यावत् अनन्तप्रदेशिकः सन्धः । द्विप्रदेशिक : स्कन्धस्त्रिप्रदेशि पेक्षया स्नः त्रिदेशि चतुः प्रदेशिकापेक्षयाऽकृत न इयुक्तरोत्तरापेक्षया अब सूत्रकार अकुत स्कंध का कथन करते हैं"से किं तं अकसिणख धे ?" इत्यादि । || सूत्र ५३ ॥ शब्दार्थ से किं तं अकिसखधे सो चेव दुपएसियाइखधे जाव अणतपएसिए खधे) अकृत्स्नस्कंध का स्वरूप इस प्रकार से है कि जो द्वि प्रदेशिक आदि स्कंध से लेकर अनन्तप्रदेशिक तक के स्कंध हैं वे सब अक्रूरनस्कध हैं । जिस स्कंध से और भी कोई दूसरा बहुत बडा स्कंध होता है - वह अपरिपूर्ण होने के कारण अकृनस्कंध है । ऐसे अपरिपूर्ण ये सब द्विप्रदेशवाले स्कंध से लेकर अनन्त प्रदेश तक के स्कंध हैं । इनमें अपरिपूर्ण ता इस प्रकार से है कि जो द्विप्रदेशिक स्कंध होता है वह त्रिप्रदेशिक स्कंध की अपेक्षा न्यून होने से अपरिपूर्ण हाता है, त्रिप्रदे शिकस्कंध चतुः प्रदेशिक स्कंध की अपेक्षा न्यून होने से अपरिपूर्ण होता है । इस तरह उत्तरोत्तर की હવે સુત્રકાર અમૃનસ્કન્ધનું નિરૂપણ કરે છે. "से किं तं अकसिणखंधे " धत्याहि शब्दार्थ - (से किं तं अकसिणख धे?) शिष्य गुरुने मेव। प्रश्न पूछे छे } હે ગુરુમહારાજ ! અકૃત્સ્ન સ્કન્ધનું સ્વરૂપ કેવુ છે? उत्तर- (अकिसिणखं सेो चे दु१ एसियाइखधे जात्र अत्तवएसिए खंधे) मत्स्नस्न्धनु स्व३ मा अारनु छे ने द्विप्रदेशिक आदि उन्धोथी सहने અનંતપ્રદેશિક પર્યંન્તના સ્કન્ધા છે, તે બધાં અકૃત્સ્નસ્કન્ધા છે. જે સ્કન્ધ કરતાં વધારે માટે કાઈ ખીને સન્ય હાઇ શકે છે, તે રકન્ધુ અપરિપૂર્ણ હાવાને કારણે કૃન સ્કન્ધ ગણાય છે. દ્વિપ્રદેશીથી લઈને અનંત પ્રદેશી પર્યન્તના સમસ્ત સ્કન્ધા આ રીતે અપરિપૂર્ણ જ હેાય છે. તેમાં અરિપૂર્ણતા આ પ્રકારે સમજવી જોઇએ જે દ્વિપ્રદેશિક :ન્ય હાય છે તે ત્રિપ્રદેશિક સ્કન્ધ કરતાં ન્યૂન હેાવાથી અપરિપૂર્ણ હાય છે, ત્રિપ્રદેશિક સ્કન્ધ ચતુઃપ્રદેશિક સ્કન્ધ_કરતાં ન્યૂન હાવાથી અપરિપૂર્ણ હાય ७. खेल प्रमाणे उत्तरोत्तर अन्धतां प्रत्ये पूर्वना (गणना) सुषमा न्यून
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy