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________________ ७३ अस्प बहुस्वद्वार का निरूपण ३८७-१९७ ७१ अर्थपद का निरूपण ३९९-१.२ ७५ मा समुत्कीर्तनता का निरूपण १०३-४.५ ७६ मनोपदर्शनता का निरूपण ४०६-४०८ ७७ समवतार के स्वरूप का निरूपण ४०८-११० ७८ अनुपम केस्वरूप का निरूपण ४१०-४२४ ७९ पूर्वानुपूर्वी आदि तीन भेदों का निरूपण ४१५-१३१ ८० पुदलास्तिकायकों अधिकृत करके तीन द्रव्यों का निरूपण ४३१-४३८ ४१ क्षेत्रानुपूर्वी का निरूपण ४३९-४४२ ८२ अर्थपद की प्ररूपणा ४४२-४५८ ८३ अर्थपद मरूपणा के प्रयोजन का निरूपण ४४९-१५० ८४ मङ्गसमुत्कीर्तनता के प्रयोजन का निरूपण ४५१-४५२ ८५ मनोपदर्शनता का निरूपण ४५२-४५६ ८६ समवतार का निरूपण ४५६-४५७ ८७ अनुगम का निरूपण ४५८-४५९ ८८ द्रव्यप्रमाण का निरूपण ४६०-४६४ ८९ क्षेत्रमाणद्वार का निरूपण ४६५-१७७ ९० स्पर्शवाद्वार का निरूपण ४७७-४७९ ९१ कालद्वार का निरूपण १८०-४८४ ९२ अन्तरद्वार का निरूपण ४८५-४९. ९३ भागद्वार का निरूपण ४९१-५०० २४. भाषद्वार का निरूपण ५०१-५०१ ९५ अल्पबहुत्वद्वार का निरूपण ५०३-५१० ९६ अनौपनिधिकी क्षेत्रानुपूर्वी का निरूपण ५११-५१६ ९७ औपनिधिकी क्षेत्रानुपूर्वी का निरूपण ५१६-५२३ ९८ अधोलोक गत क्षेत्रानुपूर्वी का निरूपण
SR No.040003
Book TitleAnuyogdwar Sutra Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1967
Total Pages861
LanguageSanskrit, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Book_Gujarati, & agam_anuyogdwar
File Size249 MB
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