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________________ 138 . स्त्रीचरित्र प्रसन्न है और राजाधिराज पृथिवीराज संयोगता संयुक्त दिल्ली जानेके लिये आपसे अनुमति चाहते हैं. - जयचन्द-आह ! क्या संयोगता पृथिवीराजके पास है ? हमने यज्ञ किया, जिसमें घृतके बदले रुधिरकी आहुति दीगई, चन्द-आप इतने दुःखित क्यों होते हैं राजाधिराज पृथिवीराज आपके पुराने व्यवहारी है. और ईश्वरने उनको सब प्रकार राजनन्दिनीके सम्बन्ध योग्य बनाया है, कन्या तो परिणाममें किसी न किसीको देनेही पडती है परन्तु ये कैसा अच्छा हुआ, कि राजकुमारीने जिसको स्वर्ण प्रतिमाके गलेमें वरमाल पहराई थी, उसीके संग सम्बन्ध होगया. - जयचन्द-चन्द ! तुम क्यों जले पर नोंन छिडकते हो ? माता पिताकी सम्मति विना सम्बन्ध होनेकी यह कौनसी रीति है ? और इस विषयमें हमारे लिये कसा लजा प्रतीत होती है ? चंद-स्वयम्वरमें माता पितासे अनुमति लेकर वर P.P. Ac: Gunratnasuri M.S..
SR No.036493
Book TitleStree Charitra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNarayandas Mishr
PublisherHariprasad Bhagirath
Publication Year1904
Total Pages236
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size175 MB
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