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________________ का चरित्रं प्राहासावेवमुक्तोऽपि / वयमाराधका न वा // प्राणांते चोपसर्गेऽपि / प्रभो तस्मिन्नुपागते // 28 // खामी प्राह विमुच्य त्वां / सर्वेऽप्याराधकाः परे / उक्तोऽप्येवं स नामुंच-द्भावित्वेन कदाग्रहं // 29 // यदि चाराधका एते / तदभूत्तच्छुभं फलं // ममेत्युक्त्वा प्रणम्येशं / सूरिः साधुयुतोऽचलत्. // 30 // कुंभकारकटोपांत-स्थितग्रामे स आगतः // तदागमनवार्तागात् / पुरे तत्र तदाखिले // 31 // 2 तदासौ पालको दथ्यौ / श्रुतश्रीस्कंदकागमः॥तिरस्कारं दधत् प्राच्य-मरिमुक्तेषुवद् हृदि // 32 // विगोपितस्तदानेन / स्वस्थानबलमाप्य यत् // विस्मृतं मेन तत्तस्य / सांप्रतं दर्शये फलं // 33 // 2 कालेनाकार्षित इव / प्रायोऽस्त्यत्र समागतः॥तभव्यमभवत् किंचित् / करिष्ये मम वांछितं // 34 // विचिंत्येति स दुष्टात्मा / वने तत्सूरिभूषिते // अगोपयदनेकानि / शस्त्राणि निजपूरुषैः // 35 // श्रीस्कंदकागमनं प्रातः, श्रुत्वा तन्नगरीजनः // तत्रैवोद्यानदेशेऽगा-द्वंदितुं भूरिभक्तितः // 36 // उद्यानपालतो मत्वा, स्वेष्टं सूरिसमागमं // राजा राज्ञीयुतः प्राप, गुरुवंदनहेतवे // 37 // व्याजहार तथा धर्म, जिनोक्तं तत्र सूरिराट् // कोमलैर्वचनैः सवों, जनस्तुष्टिमगाद्यथा // 38 // PP.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036491
Book TitleSkandakacharya Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShubhvardhan Gani
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1929
Total Pages12
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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