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________________ 35--%E9%ABH श्रीपाल- 18 तेरे पास बैठा हुआ यह शुभ लक्षणवाला कौन पुरुष है ? तब रुदन करती हुइ मयणाने गद्चरित्र. गद् कण्ठसे अपनी. सर्व कर्मकथा कह सुनाई, हे गुरुवर्य! मेरे दिलमें और कोई प्रकारका // 17 // दुःख नही है मात्र इतना ही है कि नगरीके लोग पवित्र जैन धर्मको निन्दा और मिथ्या धर्मकी है। द स्तुति करते हैं, यह असह्य दुःख मुझसे सहा नहीं जाता; अतः अनुग्रह कर कोई ऐसा पवित्र उपाय बताईये कि आपके श्रावकका ( मेरे जरिका ) रोग नाश हो जाय. परमोपकारी गुरुमहाराजने लाभ समझ कर परम पवित्र उपाय इस प्रकार दिखलायाहे भद्रे! पूर्वकृत कर्म नाश करनेके लिये चौदह पूर्वका सार लोक यमें सुख करने वाला, र सकल धर्म प्रधान, दुष्टकुष्ट हरण समर्थ, महाकष्ट हर्ता, पुत्र-पौत्र-धन-धान्य-राज्यप्रताप द कर्ता, आधि-व्याधि-शोक-सम्ताप-दौर्भाग्य-वंध्यता-विषकन्या (जिसके स्पर्शसे ज़हर चड़ जाय.) के विषको दूर करने वाला, मोक्ष पदको देने वाला इत्यादि गुण विशिष्ट 'नवपद' ISHEKHAR // 17 // Ac. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradha
SR No.036490
Book TitleShripal Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagar
PublisherGaneshmal Dadha
Publication Year1924
Total Pages198
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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