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________________ || तेरे दर्शनसे हम मलीन हो गये; हे उषी-हे दुर्गति गामी! यह कार्य करनेसे तेरा अनिष्ट होगा; कहा है: (श्लोक) अनाचारे मतिर्यस्य / स हन्ति जन्मनो द्वयं // दुर्गतिः परलोकस्य / इह लोके विडम्बना // 1 // भावार्थः—जिसकी गति अनाचारमें विद्यमान है उसने अपने दोनो भव नाश किये इस * लोकमें विटम्बना पाता है और परलोकमें दुर्गति आप्त करता है. हे सेठ! इस कार्यमें जो तुझे सलाह दे वह तेरा परम शत्रु समझना; इत्यादि वचन कह कर वे तिनों मित्र अपने 2 स्थानपर चले गये-धवलने इस बातको न माना, सचहै ! * विनाश र काले विपरीतबुद्धिः ' चौथा मित्र अभी तक वहींपर बैठा हुवा है, इस समय उसने कहा-हे वामिन् ! हृदयकी बात इनके सामने न कहना चाहिये, ये तीनो तुमारे दुश्मन हैं, मैं एक AcGunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradh
SR No.036490
Book TitleShripal Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAnandsagar
PublisherGaneshmal Dadha
Publication Year1924
Total Pages198
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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