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________________ पुण्याढ्य चरित्रं 1218 सान्वय भाषान्तर R18 00000000 एवं देवस्य तस्योक्तं श्रुत्वा दध्यो धराधिपः / अहो कियानयं मेऽभूदुपकारी द्विपामरः // 529 // अन्वयः--नृदुःपूरं तव आग्रह, च अद्य एव भावि ते किचिव लोकोत्तरं खरूपं अवधिज्ञानतः ज्ञात्वा // 525 // शुभापुर्या ज्ञान भास्करात् तपनात् तत् निश्चित्य, जैनेंद्र घिचं निर्माय, यथाविधि प्रतिष्ठाप्य // 526 // तव एव भाग्याना प्रतिहस्तकः अहं तमिन् वने क्षणात् पूर्णीकृते चैत्ये संमति अस्थापयं, // 527 // तत् (हे) कल्याणनिधे! तूर्ण एहि? चंद्राननं जिनं नत्वा पूर्णमनोरथः जगतां नमस्यः भव // 528 / / एवं तस्य देवस्य उक्तं श्रुत्वा धराधिपः दध्यो, अहो! अयं द्विपामरः मे कियान् उपकारी अभूत् // 529 // पंचमिः कुलकं / / अर्थ:-मनुष्योबडे संपूर्ण न थइ शके एवा तारा आग्रहने, तथा आजेज थनारा तारा कंइंक लोकोत्तर स्वरूपने (मोक्षने) अवधिज्ञानथी जाणीने, // 525 / / तथा शुभापुरीमा (विराजता) ज्ञानथी सूर्यसरखा एवा (ते) तपननामना मुनिराजपासेथी ते (तारी हकीकतनो) निश्चय करीने, अने जिनप्रतिमा बनावीने, तथा तेनी विधिपूर्वक प्रतिष्ठा करावीने, / / 526 // ताराज 24 DS0000000000ECISIODISED PA CUMS H a ridiovisthuntinuonally . ..
SR No.036475
Book TitlePunyadhya Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVardhamansuri
PublisherShravak Hiralal Hansraj
Publication Year1928
Total Pages229
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size64 MB
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