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________________ नीतश्च / स पुरं जनवबनं // 5 // तत्र संस्थाप्य तं राज्ये / गुह्यकोऽगान्निजास्पदं // सलील / पालयामास / देवदिन्नः सुखेन तत् // 10 // अथो मया मुनिः पृष्टो / जगवन् किमजायत॥ चरित्रं विवरांतः-प्रविष्टस्य / लक्ष्मीदेवनरेशितुः // 19 // ततो मुनिवरोऽजाणी-हिवरांतर्गते नृपे // . 245 यदो मनोरमो दिव्य-स्त्रीरूपं परिहृत्य तत् // 15 // नानाराक्षसजूतानां / रूपाण्याविश्वकार सः॥ बवितो भूपतिभृत्वा / प्रथमं नरकं ययौ // 13 // मयापछि पुनः साधु-नंगवन् ज. नयिष्यति // किं पुत्रं पुत्रिकां वा सा। देवी जुवनसुंदरी // 14 // तेनोक्तं पुत्रिकां सा च / करिष्यति कियच्चिरं // राज्यं ततो हरिषेणः / कुमारः परिणेष्यति // 15 // स राज्यं पालयन्नेत-जित्वाखिलमहीपतीन् // जरतत्रिखंगनाथो / वासुदेवो नविष्यति // 16 // इति श्रुत्वा मुनि स्तुत्वा / स्वगृहं प्राप्तवानहं // काले चाजीजनत्पुत्रीं / देवी जुवनसुंदरी // 17 // लोके प्रकाशितः पुत्रो / महदुत्सवपूर्वकं // समुदत्त इदं / तस्या नाम प्रतिष्ठितं // 17 // प्रछन्नं वर्धिता बाला / पौरुषं वेषमाश्रिता // राज्यं च पालयामास / सिंहासनस्थिता सुखं // | ॥रए // हरिषेणकुमारेछ / शृएिवयं सा कुमारिका // अहं च सुमतिमंत्री / नवदंते स- | P.P.AC.Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust
SR No.036472
Book TitlePratyekbuddh Charitram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJain Dharm Vidya Prasarak Varg
PublisherJain Dharm Vidya Prasarak Varg
Publication Year1920
Total Pages356
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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